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बदले युद्ध कौशल में ड्रोन और भारत की चुनौतियां

आधुनिक युद्धकला में ड्रोन एक अप्रत्याशित और विघटनकारी शक्ति के रूप में उभरे हैं, जो सैन्य रणनीतियों और रक्षा तैयारियों को मूलभूत रूप से बदल रहे हैं। ये मानव रहित हवाई वाहन अब युद्ध के मैदान में एक दुर्जेय हथियार बन गए हैं, जो कम लागत में भारी नुकसान पहुँचाने की क्षमता रखते हैं।

भारत के लिए, यह एक दोहरी चुनौती पेश करता है: न केवल उन्हें एक प्रभावी रक्षात्मक उपकरण के रूप में विकसित करना, बल्कि उनकी बढ़ती तस्करी और संभावित हमलों से अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी।

रूस-यूक्रेन युद्ध ने स्पष्ट रूप से दिखा दिया है कि कैसे छोटे, सस्ते और आसानी से उपलब्ध ड्रोन पारंपरिक सैन्य शक्ति को चुनौती दे सकते हैं। यूक्रेन द्वारा हाल ही में किए गए ऑपरेशन स्पाइडर वेब के तहत रूसी हवाई ठिकानों पर किए गए ड्रोन हमले एक ज्वलंत उदाहरण हैं। यह हमला द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर हुए जापानी हमले की भयावह याद दिलाता है, जहाँ बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक मारे गए थे और कई विमान नष्ट हो गए थे। हालाँकि, पर्ल हार्बर पर पारंपरिक विमानों से हमला किया गया था, जबकि यूक्रेन का हमला अत्याधुनिक ड्रोन तकनीक का प्रदर्शन था।

कम लागत पर तैयार होने वाले ड्रोन भी युद्ध का रुख बदल सकते हैं। यूक्रेन के ड्रोन हमलों की सबसे खास बात यह थी कि उन्होंने दुश्मन के उन सैन्य ठिकानों को भी आसानी से निशाना बनाया जो अत्यधिक अंदरूनी क्षेत्रों में स्थित थे, जहाँ तक पहुँचना पारंपरिक तरीकों से बेहद मुश्किल होता। यद्यपि भारत किसी भी खतरे का सामना करने और दुश्मन को करारा जवाब देने में पूरी तरह सक्षम है, फिर भी रूस पर हुए इन ड्रोन हमलों से उसे अधिक सतर्क और अपनी रक्षा रणनीतियों को अद्यतन करने की आवश्यकता है।

हाल ही में, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने तुर्की और चीन निर्मित ड्रोनों का उपयोग करके भारत पर दबाव बनाने का प्रयास किया था, जो भारत के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी थी। यह स्पष्ट है कि भारत को न केवल ड्रोन हमलों से निपटने के लिए एक मजबूत ढाँचा तैयार करना होगा, बल्कि देश में ड्रोन निर्माण को भी बढ़ावा देना होगा ताकि आत्मनिर्भरता सुनिश्चित की जा सके। चीन इस क्षेत्र में एक प्रमुख खिलाड़ी है, जिसने ड्रोन निर्माण उद्योग को व्यापक सरकारी समर्थन दिया है। इसी का परिणाम है कि वैश्विक ड्रोन बाजार का 90 प्रतिशत हिस्सा चीनी कंपनी डीजेआई के नियंत्रण में है।

विडंबना यह है कि यूक्रेन द्वारा उपयोग किए जाने वाले अधिकांश ड्रोन भी चीन निर्मित पुर्जों का उपयोग करते हैं। यहां तक कि जिन ड्रोनों ने रूस में तहलका मचाया, उनमें से कई तस्करी कर लाए गए थे और फिर ट्रकों के माध्यम से अपने लक्ष्य के करीब पहुँचाए गए।

यह दर्शाता है कि ड्रोन तकनीक कितनी आसानी से उपलब्ध है और इसका दुरुपयोग कितना आसान हो सकता है। भारत में भी ड्रोनों की तस्करी एक गंभीर चिंता का विषय बन गई है।

2024-25 वित्तीय वर्ष के दौरान, चेन्नई एयर कस्टम्स ने सिंगापुर, मलेशिया और संयुक्त अरब अमीरात से आए यात्रियों से 2 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के कम से कम 200 चीनी निर्मित ड्रोन जब्त किए। विशेषज्ञों का अनुमान है कि तस्करी के केवल दस प्रतिशत प्रयास ही विफल होते हैं, जिसका अर्थ है कि जब्त किए गए ड्रोनों की तुलना में कहीं अधिक ड्रोन पहले ही भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं।

यह स्थिति पूरे देश में अभूतपूर्व सतर्कता की मांग करती है, विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों के पास। इस उभरती हुई चुनौती का सामना करने के लिए भारत को एक बहु-आयामी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है।

भारत को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप उन्नत ड्रोन प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान और विकास में भारी निवेश करना होगा। सीमा सुरक्षा बलों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को ड्रोन तस्करी के नेटवर्क को तोड़ने के लिए अधिक सशक्त और प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। भारत को सीमा पर और देश के भीतर महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थलों जैसे परमाणु संयंत्रों, हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा के लिए अत्याधुनिक काउंटर-ड्रोन सिस्टम में अधिक निवेश करना होगा।

इनमें जैमिंग तकनीक, लेजर हथियार, और इंटरसेप्टर ड्रोन जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं। सुरक्षा एजेंसियों को ड्रोन खतरों के बारे में निरंतर प्रशिक्षित किया जाना चाहिए और जनता को भी संभावित ड्रोन गतिविधियों की रिपोर्ट करने के लिए जागरूक किया जाना चाहिए।

संक्षेप में, ड्रोन अब युद्ध के एक नए युग का प्रतीक हैं। भारत को इस वास्तविकता को स्वीकार करते हुए अपनी रक्षा तैयारियों को एक नई दिशा देनी होगी। केवल सतर्कता और प्रौद्योगिकी में निवेश ही हमें भविष्य के ऐसे अप्रत्याशित हमलों से बचा सकता है। क्या भारत इस नई चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है?