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आयुष्मान योजना का ढोल बजाने वालों को सच्चाई पता नहीं

अस्पतालों को एक साल से नहीं हुआ भुगतान

  • खानापूर्ति कर रहे हैं स्वास्थ्य अधिकारी भी

  • अस्पतालों को हर रोज नये निर्देश जारी हो रहे

  • बकाया भुगतान के सवाल पर विभाग में चुप्पी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः राज्य में प्रधानमंत्री आयुष्मान योजना का हाल बुरा है। हाल ही में इस बात की चर्चा हुई थी कि अनेक अस्पताल इस श्रेणी के मरीजों को ईलाज के लिए अतिरिक्त धन की मांग कर रहे हैं और जो यह रकम नहीं दे पा रहे हैं, उन्हें योजना का लाभ देने से इंकार किया जा रहा है। इस संबंध में हंगामा होने पर स्वास्थ्य सचिव यह बयान देकर जिम्मेदारी टाल गये कि मरीजों से अतिरिक्त रकम की वसूली करने वाले अस्पतालों को कार्रवाई की जाएगी।

विधानसभा का सत्र जारी होने की वजह से सरकारी स्तर पर कागजी घोड़े दौड़ाये गये। सूत्र बताते हैं कि अपनी गरदन बचाने के लिए आनन फानन में रांची के सिविल सर्जन सह मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी ने सभी निजी अस्पतालों के नाम पर एक पत्र जारी कर दिया। गत बीस मार्च की तिथि से जारी इस पत्र में सभी अस्पतालों को मरीजों से पैसा नहीं लेने की हिदायत दी गयी है।

इस पत्र की प्रति उपायुक्त से लेकर विभाग के उच्चाधिकारियों को भी भेजी गयी है। इस पत्र में कहा गया है कि आयुष्मान भारत मुख्यमंत्री योजना के तहत मरीजों से पैसा लेना कानूनन गलत है और किसी भी ऐसे मान्यताप्राप्त अस्पताल को मरीजों से पैसा लेने का अधिकार नहीं है। अस्पतालों को इसका उल्लंघन होने पर दंडित किये जाने की भी बात कही गयी है।

दूसरी तरफ इस मामले की तह मे जाने पर पता चला कि योजना के तहत निर्धारित सभी आवश्यक दिशानिर्देशों का पालन करने वाले अस्पतालों को बार बार पैनल से बाहर करने की धमकी दी जा रही है। इस क्रम में जानकारी मिली कि पिछले एक साल से इस योजना के तहत ईलाज करने वाले अस्पतालों का भुगतान लंबित है।

दिसंबर 2024 में किए गए दस्तावेजों के भौतिक सत्यापन के बावजूद अभी भी आपकी ओर से कोई मंजूरी और भुगतान नहीं हुआ है। कुछ विशेषज्ञों ने यह सवाल उठाया है कि नियमों और योजना का पालन करना क्या सिर्फ अस्पतालों की जिम्मेदारी है। समय सीमा का पालन निजी अस्पताल कैसे कर सकते हैं जबकि एमएमजेएवाई के पास खुद के लिए कोई दिशा-निर्देश नहीं हैं।

टीएमएस 2.0 में संक्रमण के लिए समय-सीमा दी गई थी, एचईएम 2.0 में संक्रमण के लिए समय-सीमा दी गई थी, यूएमपी पंजीकरण के लिए समय-सीमा दी गई थी, जिसका अस्पतालों ने पालन किया। फिर भी नये नए विशेषज्ञों के अनुमोदन के लिए आवेदन छह महीने से अटका हुआ है। जो डाक्टर इस योजना के सॉफ्टवेयर में पंजीकृत नहीं हैं, तो वे ऑपरेशन करेंगे।

ऐसे मामलों में अस्पताल उस मामले का इलाज करने से मना कर देता है, यदि विशेषज्ञ आपके द्वारा अनुमोदित नहीं है। यह कहा गया है कि किसी योजना को सुचारू रूप से चलाना चाहते हैं, तो अनुपालन और समस्याओं का समाधान द्विपक्षीय होना चाहिए। इसके अलावा, किसी भी अस्पताल से अनंत अवधि के लिए वित्तीय भुगतान वापस लेना अनुचित है, इस बारे में अस्पतालों के प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया जा रहा है। यानी विभागीय अधिकारी भी कागजी घोड़ा दौड़ा रहे हैं। मरीजों की भलाई की वास्तविक चिंता उन्हें नहीं है।