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मोदी को औकात बताने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा संघ

पहले नड्डा फिर अमित शाह का नंबर


  • नड्डा ने दिया था विवादास्पद बयान

  • आरएसएस गडकरी का नाम बढ़ा सकता है

  • अमित शाह दूसरे दलों के भी निशाने पर है


राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः पिछले दस वर्षों में जैसे-जैसे नरेंद्र मोदी मजबूत हुए हैं, ऐसे आरोप लगने लगे हैं कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आरएसएस और संघ परिवार से दूर होता जा रहा है। दो हफ्ते पहले भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक इंटरव्यू में पार्टी और संघ के रिश्ते को लेकर कहा था, पहले भाजपा एक छोटी पार्टी थी। अब भाजपा परिपक्व और सक्षम है।

इसलिए भाजपा अब अकेले चुनाव लड़ सकती है। संघ नेतृत्व ने इसे अच्छे से नहीं लिया। भाजपा के कई नेताओं ने घरेलू तौर पर माना है कि इससे दोनों खेमों के बीच दूरियां बढ़ेंगी। कई लोगों के अनुसार, यह तथ्य कि आज भाजपा के पास एक भी बहुमत नहीं है, आरएसएस के लिए यह एक अभिशाप में वरदान है।

इस बार वे भाजपा पर खोया हुआ कुछ नियंत्रण फिर से हासिल कर लेंगे, खासकर सरकारी नीति निर्धारण में। इसमें सबसे पहले दरअसल, नड्डा की विदाई भी तय है। अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल पिछले जनवरी में समाप्त हो गया था लेकिन जून तक बढ़ा दिया गया था। इस बार उन्हें इस अफसोस के साथ जाना होगा कि चुनाव में भाजपा का नतीजा उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। सूत्रों के मुताबिक, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर अगले अध्यक्ष बनने की रेस में सबसे आगे हैं। अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नितिन गडकरी जैसे नाम को भी आगे बढ़ा सकता है।

सूत्रों के मुताबिक, संघ इस चुनाव में मोदी की लोकप्रियता के साथ-साथ जिस तरह से सरकार ने विभिन्न जन-उन्मुख परियोजनाओं को हाशिये पर पड़े लोगों के घरों तक पहुंचाया है, उसे ही प्रचार का मुख्य हथियार बनाना चाहता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के पहले से अधिक मजबूत होने के आख्यान को भी अभियान में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। लेकिन भाजपा ने मोदी गारंटी को सामने रखकर प्रचार किया। संघ नेताओं ने इस बात पर संदेह व्यक्त किया कि केवल एक नेता के साथ चार सौ पार का अभियान बाकी साथियों को कितना मना पाएगा। नतीजा यह है कि प्रचार के मुद्दे पर दोनों खेमों के बीच दूरियां बनी हुई हैं।

चुनाव से ठीक पहले भ्रष्टाचार के आरोपी नेताओं को भाजपा में शामिल करने और उन्हें टिकट देने पर आरएसएस को कड़ी आपत्ति थी। खासकर महाराष्ट्र में अशोक चव्हाण के एनसीपी के अजित पवार से हाथ मिलाने को लेकर संघ कार्यकर्ताओं को जमीनी स्तर पर सवालों का सामना करना पड़ रहा था। आरएसएस की आपत्ति का दूसरा कारण यह था कि उन नेताओं को संघ के आदर्शों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। वह आपत्ति टिक नहीं पाई।

आरएसएस को उम्मीद है कि इस बार के नतीजों के बाद आने वाले दिनों में पार्टी में भ्रष्ट लोगों की एंट्री कम होगी। पिछले दशक में संघ कार्यकर्ताओं को भाजपा कार्यकर्ताओं ने घेर लिया था। इसी वजह से इस बार संघ के ज्यादातर कार्यकर्ता वोट में घर पर बैठे। जिसका असर वोटिंग दर पर पड़ता है। महाराष्ट्र के अलावा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में मतदान दर में गिरावट देखी गई है, क्योंकि बहुत से लोग वोट देने नहीं निकले। इनमें से ज्यादातर भाजपा के वोटर हैं। ऐसे में संघ को लगता है कि उन राज्यों में भाजपा संगठन की विफलता के बारे में सोचना जरूरी है। इसी क्रम में संघ के निशाने के साथ साथ कई घटक दलों के निशाने पर अमित शाह भी है। लिहाजा उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखाने की पुरजोर कोशिश होगी

संघ नेतृत्व के अनुसार, उनकी चिंताओं के बावजूद, भाजपा नेताओं ने बेरोजगारी के मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया। इस बार चुनाव में बेरोजगारी एक अहम मुद्दा बन गया है। ‘अग्निवीर‘ प्रोजेक्ट पर भी गुस्सा था। इन सबके परिणामस्वरूप युवा समाज का एक हिस्सा दूर चला गया है। आरएसएस का मानना ​​है कि नई सरकार का मुख्य लक्ष्य भविष्य में आय बढ़ाना होना चाहिए। अब सहयोगियों के सहयोग के बिना भाजपा की सरकार बनना असंभव है। भाजपा के भीतर यह सवाल है कि मोदी उनसे कैसे संबंध रखेंगे। कई लोगों का मानना ​​है कि जब साझेदार लेने की बात आती है तो नितिन गडकरी सर्वश्रेष्ठ विकल्प हैं। हालाँकि वे जानते हैं, इस बिंदु पर मोदी को हटाना लगभग असंभव है।