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मौसम प्यार का रंग बदलता .. .. .. ..

नीतीश कुमार क्या करेंगे, यह कौन बनेगा करोड़पति का सबसे हॉट सवाल था, जिसका रिजल्ट आउट हो चुका है। लेकिन सिर्फ इस एक सवाल से एक साथ कई परिदृश्य साफ हो जाते हैं। अयोध्या में श्रीराम मंदिर के उदघाटन के बाद ऐसा माहौल बनाया गया था कि इस बार भाजपा को चार सौ सीट पाने से कोई रोक नहीं पायेगा।

अगर बिना नीतीश के भी चार सौ सीट पाने का वाकई सही अनुमान था तो भाजपा के चाणक्य को रात जागकर बिहार भाजपा के नेताओं को स्कूली बच्चों की तरह पाठ पढ़ाने की कोई जरूरत नहीं थी। दूसरी तरफ अगर वाकई नीतीश कुमार को अपनी ताकत पर पूरा भरोसा था तो किसी भी खेमा में रहने से उनकी सेहत पर कोई असर तो नहीं पड़ता।

यानी बिहार के इस उधेड़बून में साफ है कि कोई भी पक्ष अपनी जीत के लिए पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। इसलिए एक एक सीट के लिए मगजमारी चल रही है। वरना कोई रहे या कोई जाए, क्या फर्क पड़ता है। कर्नाटक को ही देख लीजिए, पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार फिर से भाजपा में लौट गये तो कांग्रेस ने गंभीरता से नहीं लिया। उड़ीसा में पूर्व मुख्यमंत्री गिरिधर गोमांगो कांग्रेस में शामिल हो गये तो नवीन पटनायक को कोई चिंता नहीं हुई। फिर बिहार और नीतीश ही क्यों।

दरअसल नरेंद्र मोदी ने एक चाल अच्छी चल दी है कि जननायक कपूर्री ठाकुर को भारत रत्न देने का एलान कर दिया है। इससे बिहार के पुराने वोटरों में से समाजवादी सोच रखने वालों को बहुत सी पुरानी बातें याद आ गयी हैं, जो आने वाले दिनों में चर्चा के बाजार से होकर चुनावी मुद्दा बन जाएंगे। शायद इस एक फैसले से नीतीश कुमार का अचानक से हृदय परिवर्तन होने लगा है।

बात सिर्फ बिहार की नहीं है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी अड़ गयी तो कांग्रेस के नेता उन्हें मनाने में जुटे हैं। मौके देखकर चौका लगाने वाले पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी कह दिया है कि वह पंजाब में लोकसभा का चुनाव बिना कांग्रेस के ही लड़ लेंगे और बगल के राज्य हरियाणा में भी चुनाव लड़ेंगे।

कुल मिलाकर इंडिया गठबंधन को जितना मजबूत बताने का प्रयास किया गया था, वह अंदर से उतनी ही कमजोर नजर आने लगी है। वैसे इसका फायदा भी भाजपा और नरेंद्र मोदी को ही होना है। जिनकी पूरी कोशिश यही है कि किसी भी तरह विपक्षी वोट एकजुट नहीं होने पाये। वरना वोटों का प्रतिशत अबकी बार चार सौ पार के नारे को मिट्टी में मिला सकता है।

इसी बात पर ऋषि कपूर की फिल्म सितमगर का एक गीत याद आने लगा है। इस गीत को लिखा था मजरूह सुलतानपुरी ने और संगीत में ढाला था आर डी वर्मन ने। इसे आशा भोंसले और किशोर कुमार ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

मौसम प्यार का, रंग बदलता रहे

यूँ ही चलता रहे, तेरे मेरे प्यार का कारवाँ

ओ… ओ…

मौसम प्यार का, रंग बदलता रहे

यूँ ही चलता रहे, तेरे मेरे प्यार का कारवाँ

ठंडी हवा मतवाली, कहे हमारे संग उड़के

अभी कहीं देखो ना मुड़के

हो, पीछे अब कहाँ ये नज़ारे ये समा…

मौसम प्यार का, रंग बदलता रहे

यूँ ही चलता रहे, तेरे मेरे प्यार का कारवाँ

कहाँ कहाँ से होके तुझ तक

लायी है मुझको ये राहें

छोड़ूंगा मैं कैसे ये बाहें

अरे, अब तो ऐ सनम तू जहाँ मैं वहाँ …

मौसम प्यार का, रंग बदलता रहे

यूँ ही चलता रहे, तेरे मेरे प्यार का कारवाँ

किसी हसीन सफ़र में बीते ये ज़िंदगानी

किशोर: दो हमसफ़र मंज़िल अंजानी

किसी हसीन सफ़र में बीते ये ज़िंदगानी

दो हमसफ़र मंज़िल अंजानी

हो… अब आये बहार, या चले आँधियाँ

मौसम प्यार का, रंग बदलता रहे

यूँ ही चलता रहे …

तेरे मेरे प्यार का …

कारवाँ यूँ ही चलता रहे

पॉलिटिक्स से अलग हटें तो ईडी का अलग पॉलिटिक्स चल रहा है। झारखंड में ईडी के खेल में अब राज्यपाल भी शामिल हो गये हैं। दूसरी तरफ तमिलनाडू में ईडी अफस के खिलाफ पुलिस जांच से ईडी खुद परेशान है। सुप्रीम कोर्ट में उस मामले पर सुनवाई हो रही है। इनसे अलग पश्चिम बंगाल में ईडी के अफसरों पर हमला के बाद से मुख्य अभियुक्त पकड़ से बाहर तो है लेकिन फेसबुक से अपने समर्थकों को 26 जनवरी की बधाई दे रहा है। कुल मिलाकर पूरी ईडी की गोलमाल की वजह से किधर जाएं और किधर ना जाए, के पशोपेश में है। अलबत्ता प्यार के इस मौसम में बहुत दिनों से दिल्ली की आम आदमी पार्टी के खिलाफ ईडी या उपराज्यपाल की कोई कार्रवाई सामने नहीं आयी है। शायद वहां भी चुनावी मौसम के बिगड़ने का इंतजार है लेकिन इतना कुछ करने के बाद भी अगर दिल्ली की सात सीटें भाजपा के पाले में नहीं आयीं तो आने वाले लोकसभा में भाजपा की सरकार रहे या ना रहे, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का मुद्दा दर्द पैदा करने जा रहा है। इससे साफ हो गया है कि चुनावी राजनीति के सेंटर स्टेज पर भाजपा के चाणक्य नहीं बिहार के सुशासन बाबू हैं।