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जनहित के मुद्दों पर सरकार से सवाल पूछना मानहानि नहीं

नेताओं को आलोचना स्वीकार करनी चाहिए: अदालत

नईदिल्लीः दिल्ली की एक अदालत ने टिप्पणी की है कि सरकार से सवाल पूछना, खासकर किसी जन प्रतिनिधि द्वारा, मानहानि के दायरे में नहीं आता। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र में राजनेताओं को आलोचना झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। अदालत ने यह टिप्पणी दिल्ली के मंत्री प्रवेश साहिब सिंह द्वारा आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि की शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार करते हुए की।
यह शिकायत एसएस मोटा सिंह स्कूल ट्रस्ट के एक ट्रस्टी की नियुक्ति में कथित अनियमितताओं और एक पॉक्सो मामले से निपटने के तरीके को लेकर सौरभ भारद्वाज द्वारा सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों और वीडियो के खिलाफ दर्ज कराई गई थी।
अदालत ने कहा कि जन प्रतिनिधियों से सवाल पूछने की क्रिया को मानहानि मानना लोकतंत्र के युग में एक काला अध्याय जैसा होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रेस और जनता को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार है और चुने हुए प्रतिनिधियों को भिन्न विचारों को सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए।
अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट्स को यदि समग्र रूप से पढ़ा जाए, तो यह सरकार के कामकाज की आलोचना दर्शाते हैं, न कि शिकायतकर्ता पर मानहानिकारक लांछन। एक सामान्य व्यक्ति इन्हें सरकार के कथित ढुलमुल रवैये पर सवाल उठाने के रूप में ही समझेगा। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि राजनीतिक हस्तियों और दलों से जुड़े सार्वजनिक विमर्श में आपराधिक मानहानि का दायरा अधिक सख्त होना चाहिए। विपक्ष के प्रवक्ता के रूप में सत्ता से सवाल पूछना और नीतियों की समीक्षा करना उनका सार्वजनिक कर्तव्य है, जो सत्ता के दुरुपयोग और तानाशाही प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने का काम करता है।
अदालत ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता ने अदालत के समक्ष पूर्ण सत्य उजागर नहीं किया था। अंत में अदालत ने कहा, जो याचिकाकर्ता न्याय की प्रक्रिया को दूषित करने का प्रयास करता है, वह किसी राहत का हकदार नहीं है। किसी को भी व्यर्थ याचिकाओं के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।