जहर से जहर को काटने की पुरानी कहावत सही साबित हुई
वेस्टर्न डायमंडबैक के खून में यह गुण
एफईटीयूए-3 नामक एक खास प्रोटीन है
वर्तमान एंटीवैनम से दस गुणा प्रभावी
राष्ट्रीय खबर
रांचीः विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, पूरी दुनिया में हर साल लगभग 81,000 से 1,38,000 लोगों की मौत सांप के काटने से होती है। दुनिया भर में हर साल करीब 45 से 54 लाख लोगों को सांप काटते हैं। जहरीले दंश: इनमें से 18 से 27 लाख मामलों में सांप का जहर शरीर में फैलता है। मौतों के अलावा, हर साल लगभग 4,000,000 (4 लाख) लोग सांप के काटने के कारण अंगों के कटने या अन्य गंभीर शारीरिक विकलांगता का शिकार हो जाते हैं। सांप काटने से सबसे ज्यादा मौतें दक्षिण एशिया (विशेषकर भारत) और सब-सहारा अफ्रीका में दर्ज की जाती हैं। भारत की स्थिति:दुनिया में सांप के काटने से होने वाली कुल मौतों में से सबसे बड़ा हिस्सा भारत में होता है। भारत में हर साल औसतन 50,000 से 58,000 लोगों की जान सर्पदंश के कारण जाती है।
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अब यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के शोधकर्ताओं ने सांपों के प्राकृतिक बचाव तंत्र का इस्तेमाल करके सांप के काटने का एक नया और असरदार इलाज खोज निकाला है। इस तकनीक में वेस्टर्न डायमंडबैक रैटलस्नेक के खून में पाए जाने वाले टॉक्सिन-ब्लॉकिंग प्रोटीन का उपयोग किया गया है, जिन्हें सांपों ने जहर से खुद का बचाव करने के लिए विकसित किया है।
मैरीलैंड यूनिवर्सिटी में जीव विज्ञान के प्रोफेसर सीन बी. कैरोल के नेतृत्व में किया गया यह अध्ययन प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफसेज में प्रकाशित हुआ है। वर्तमान में मौजूद एंटीवेनम बड़े जानवरों के खून से एंटीबॉडी निकालकर बनाए जाते हैं। ये महंगे होने के साथ-साथ गंभीर इम्यून रिएक्शन भी पैदा कर सकते हैं। इसके अलावा कई बार यह एंटीवैनम सभी स्थानों पर उपलब्ध भी नहीं होता है।
वर्ष 2022 में प्रोफेसर कैरोल की लैब ने पाया कि रैटलस्नेक के खून में एफईटीयूए-3 नामक एक खास प्रोटीन होता है। यह प्रोटीन रैटलस्नेक और अन्य सांपों के जहर में मौजूद घातक मेटलोप्रोटीनिएज टॉक्सिन को बेअसर कर सकता है। जब शोधकर्ताओं ने अलग-अलग एफईटीयूए प्रोटीनों का संयोजन बनाकर परीक्षण किया, तो इसके नतीजे बेहद चौंकाने वाले रहे। प्रयोगशाला में तैयार यह प्रोटीन कॉम्बिनेशन रैटलस्नेक के जहर को पूरी तरह बेअसर करने में सफल रहा और यह मौजूदा भेड़-आधारित एंटीवेनम की तुलना में करीब 10 गुना अधिक प्रभावी पाया गया। इसके अलावा, इसने विभिन्न वाइपर प्रजातियों के जहर के खिलाफ भी व्यापक सुरक्षा प्रदान की।
शोधकर्ताओं का मानना है कि इस प्राकृतिक विष-रोधी फॉर्मूले का पहला व्यावसायिक उपयोग पशु चिकित्सा में किया जा सकता है, जिसके बाद मनुष्यों के लिए दवा उपलब्ध होगी। यह तकनीक पारंपरिक एंटीवेनम की तुलना में अधिक सुरक्षित, सस्ती और बड़े पैमाने पर बनाने में आसान होगी।
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