राजनीति भी आजकल मौसम की तरह हो गई है, कब कौन सा मिजाज बदल जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। वरना कौन सोचता था कि जिस पार्टी के दफ्तर के बाहर कभी चंदे की रसीद कटवाने के लिए लंबी कतारें लगती थीं, आज उसी पार्टी के नेता चंदे के नाम पर कतराते फिरेंगे। जनाब, राम मंदिर चंदा चोरी के आरोपों और पेपर लीक के इस अनोखे कॉम्बो ने सियासत का ऐसा चक्रव्यूह रचा है कि हमारे हुक्मरानों को यह समझ नहीं आ रहा है कि वे चक्रव्यूह से बाहर निकलें या पद्मव्यूह की तर्ज पर कोई नया गोलमोल भाषण तैयार करें।
हालात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्यसभा में हमारे माननीय सभापति महोदय को आखिरकार यह हिदायत देनी ही पड़ गई कि संसदीय कार्य मंत्री जी को सदन की भावना से अवगत करा दिया जाए। अब इसे सियासत का बड़प्पन कहें या लाचारी, कि मंत्री जी की अनुपस्थिति पर सभापति को भी तंज कसना पड़ जाए! लगता है मंत्रियों ने भी मान लिया है कि गायब होना ही सबसे बेहतरीन कूटनीति है। जब तक आप दिखेंगे नहीं, तब तक आप पर सवाल उठेगा नहीं। अब लगता है कि पहली बार ऊंट पहाड़ के नीचे आया है। जिन्हें पर्वत समान चरित्र के तौर पर बनाया गया था, कठिन चुनौती में वे रेत के महल की तरह गिर रहे हैं।
इसी बात पर एक पुरानी फिल्म का एक गीत याद आने लगा है। फिल्म छोटी बहन के लिए इस गीत को लिखा था शैलेंद्र ने और संगीत में ढाला था शंकर जयकिशन ने। इसे मुकेश कुमार ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।
जाऊँ कहाँ बता ऐ दिल दुनिया बड़ी है संगदिल
चाँदनी आई घर जलाने सुझे न कोई मंज़िल
जाऊँ कहाँ बता ऐ दिल दुनिया बड़ी है संगदिल
चाँदनी आई घर जलाने सुझे न कोई मंज़िल
जाऊँ कहाँ बता …
बनके टूटे यहाँ आरज़ू के महल
ये ज़मीं आसमाँ भी गये हैं बदल
कहती है ज़िंदगी इस जहाँ से निकल
कहती है ज़िंदगी इस जहाँ से निकल
जाऊँ कहाँ बता ऐ दिल दुनिया बड़ी है संगदिल
चाँदनी आई घर जलाने सुझे न कोई मंज़िल
जाऊँ कहाँ बता ऐ दिल दुनिया बड़ी है संगदिल
चाँदनी आई घर जलाने सुझे न कोई मंज़िल
जाऊँ कहाँ बता …
हाय इस पार तो आँसुओं की डगर
जाने उस पार क्या वो किसे है खबर
ठोकरें खा रही हर कदम पर नज़र
ठोकरें खा रही हर कदम पर नज़र
जाऊँ कहाँ बता ऐ दिल दुनिया बड़ी है संगदिल
चाँदनी आई घर जलाने सुझे न कोई मंज़िल
जाऊँ कहाँ बता ऐ दिल दुनिया बड़ी है संगदिल
चाँदनी आई घर जलाने सुझे न कोई मंज़िल
जाऊँ कहाँ बता …
वैसे, सरकार के सामने चुनौती सिर्फ संसद के भीतर ही नहीं, बल्कि मैदान-ए-जंग यानी जनता के बीच भी है। पहले तो सरकार का पुराना और आजमाया हुआ फॉर्मूला था कि हर विरोध प्रदर्शन को राष्ट्रविरोधी घोषित कर दो और बात खत्म। लेकिन इस बार नाराज जनता ने फॉर्मूले की ऐसी-तैसी कर दी है। कई जगहों पर हमारे आदरणीय विधायक जी और सांसद महोदय पब्लिक रिलेशन के चक्कर में जनता की ऐसी सप्रेम भेंट पा चुके हैं कि उनकी गाड़ियां तक हवा हो गईं। बंगाल की राजनीति में कभी भाजपा ने जिस अंडा थेरेपी का बड़े चाव से शुभारंभ किया था, अब लगता है कि उसी थेरेपी की एक्सपायरी डेट निकल चुकी है और वह घूम-फिरकर खुद उन्हीं के राजनीतिक मेनू में परोसी जा रही है।
और तो और, विपक्ष भी इस बार पूरी फुल फॉर्म में है। संसद से लेकर सड़क तक राहुल गांधी ने इस बार सबूतों का ऐसा पिटारा खोला है कि सरकार के तरकश के सारे तीर फुस्स साबित हो रहे हैं। सरकार कहती रह गई कि पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं हुआ, तो भाई साहब ने सीधे उस घायल युवक को ही कैमरे के सामने लाकर खड़ा कर दिया, जिसकी बदन और आंखों पर इसके छर्रे आज भी गवाही दे रहे हैं। अब आप सबूत को झुठलाएं तो कैसे झुठलाएं?
कुल मिलाकर, स्थिति यह है कि सरकार को अभी यह सूझ ही नहीं रहा है कि किस मुद्दे का मुकाबला कैसे किया जाए। चंदे के हिसाब से लेकर पेपर लीक तक, और अंडा थेरेपी से लेकर पैलेट गन के छर्रों तक—हर तरफ एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें कोई अभिमन्यु फंसने को तैयार नहीं है, बल्कि पूरी की पूरी सरकार ही चक्कर काट रही है। लगता है आने वाले दिनों में सियासत का यह नया थर्मोमीटर पारा और हाई करने वाला है, बस देखना यह है कि इस सियासी बुखार की कौन सी दवा कारगर साबित होती है!