जांच के नौ साल गुजरने के बाद भी कोई नतीजा नहीं
अधूरे इंसाफ का सवाल सबसे अहम है
गबन करने वालों के लिए इतनी छूट क्यों
गंगा के पार का व्यक्ति चर्चा में बना रहा
दीपक नौरंगी
भागलपुरः बिहार के इतिहास के सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में शुमार ‘सृजन घोटाला’ को उजागर हुए नौ साल पूरे होने वाले हैं। करीब एक दशक पहले सामने आए इस हजारों करोड़ रुपये के सरकारी धन की कथित लूट ने प्रशासनिक व्यवस्था की नींव हिलाकर रख दी थी। हालांकि, आज भी आम जनता के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कानून इस घोटाले के असली गुनहगारों तक पहुंच पाया है?
2017 में जब यह मामला उजागर हुआ था, तब यह दावा किया गया था कि जांच की हर परत को खंगाला जाएगा और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने वालों को कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी। लेकिन नौ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद जमीनी तस्वीर काफी अलग नजर आती है। गबन की गई भारी-भरकम राशि की रिकवरी नाममात्र की ही हो पाई है।
सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह है कि आखिर कैसे चौदह वर्षों तक सरकारी विभागों के बैंक खाते चुपचाप खाली होते रहे और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी? और यदि यह पूरी निगरानी व्यवस्था विफल हो चुकी थी, तो इसकी जवाबदेही आखिर किसकी तय की गई?
सीबीआई की जांच प्रक्रिया पर भी लगातार सवालिया निशान लगते रहे हैं। विपक्ष और आम नागरिकों का यह स्पष्ट आरोप रहा है कि जांच केवल निचले स्तर के कर्मचारियों, बैंक कर्मियों और बिचौलियों तक ही सीमित रही, और वह उन प्रभावशाली लोगों तक नहीं पहुंच पाई जिनके राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के बिना इतने बड़े स्तर पर वित्तीय गबन को अंजाम देना असंभव था। कई पूर्व अधिकारियों के नाम सामने आने के बावजूद अधिकांश मामलों में अब भी अंतिम निष्कर्ष जनता के सामने नहीं आ सका है। उदाहरण के लिए, भागलपुर के पूर्व डीएम के पीए रहे प्रेम कुमार को सीबीआई द्वारा क्लीन चिट दिए जाने के बाद, जब उसे हाल ही में निगरानी विभाग की टीम ने घूस लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा, तो केंद्रीय जांच एजेंसी की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हुए। ऐसे मामलों में देश के शीर्ष नेतृत्व और जांच एजेंसियों को आत्मविश्लेषण करने की आवश्यकता है ताकि आम जनता का भरोसा बरकरार रह सके।
सृजन घोटाला महज एक आर्थिक अपराध नहीं था, बल्कि यह सरकारी व्यवस्था, बैंकिंग तंत्र और निगरानी प्रणाली की सामूहिक विफलता का प्रतीक है। नौ वर्षों के बाद भी यदि जनता यह जानने में असमर्थ है कि पूरा पैसा आखिर कहां गया, किसने उसे हड़पा और इसके लिए अंतिम रूप से कौन जिम्मेदार है, तो यह न्याय प्रक्रिया की सुस्ती को दर्शाता है।