राष्ट्रपति भवन में आयोजित हुआ विशेष समारोह
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ओल चिकी लिपि में प्रकाशित हुआ है
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आदिवासियों को जोड़ने का नया प्रयास
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उप राष्ट्रपति भी समारोह में मौजूद थे
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: भारतीय गणतंत्र के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ते हुए, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गुरुवार, को राष्ट्रपति भवन के सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित एक गरिमामय समारोह के दौरान संथाली भाषा में भारत के संविधान का विमोचन किया। यह पहला अवसर है जब देश के सर्वोच्च कानून को संथाली भाषा की अपनी विशिष्ट ओल चिकी लिपि में प्रकाशित कर सार्वजनिक किया गया है। यह कदम न केवल भाषाई समावेशिता को दर्शाता है, बल्कि भारत के जनजातीय समुदायों को देश की मुख्यधारा की लोकतांत्रिक व्यवस्था से जोड़ने की एक सशक्त पहल भी है।
संथाली भाषा भारत की सबसे प्राचीन और समृद्ध जीवित भाषाओं में से एक है। इसकी महत्ता को देखते हुए, इसे वर्ष 2003 के 92वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। वर्तमान में, यह भाषा मुख्य रूप से झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार और असम के कुछ हिस्सों में रहने वाले करोड़ों जनजातीय समुदायों की पहचान और अभिव्यक्ति का माध्यम है।
इस ऐतिहासिक अवसर पर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति मुर्मू भावुक नजर आईं। उन्होंने कहा, यह केवल एक पुस्तक का अनुवाद नहीं है, बल्कि करोड़ों संथाली भाषी लोगों के लिए गर्व, सम्मान और आत्म-पहचान का विषय है।
अब तक हमारे जनजातीय भाई-बहन अपनी कानूनी व्याख्याओं के लिए अन्य भाषाओं पर निर्भर थे, लेकिन अब वे भारत के गौरवशाली संविधान को अपनी मातृभाषा और अपनी प्रिय ओल चिकी लिपि में पढ़ सकेंगे। उन्होंने आगे जोर देते हुए कहा कि जब लोग अपनी भाषा में अपने मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों को समझेंगे, तब वे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में और अधिक सक्रिय रूप से भागीदार बनेंगे और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे।
राष्ट्रपति ने इस जटिल कार्य को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और उनके मंत्रालय की पूरी टीम की विशेष सराहना की। उन्होंने उल्लेख किया कि संविधान के निर्माण के शताब्दी वर्ष के निकट इस महत्वपूर्ण कार्य का पूरा होना भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रतीक है।
समारोह में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन, कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी व भाषाई विशेषज्ञ उपस्थित थे। वक्ताओं ने इसे भाषाई न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम बताया। विशेषज्ञों का मानना है कि संथाली भाषा में संविधान की उपलब्धता से हाशिए पर रहने वाले समुदायों, विशेषकर सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं और बुजुर्गों में संवैधानिक मूल्यों के प्रति समझ बढ़ेगी, जिससे देश का लोकतांत्रिक ढांचा और अधिक मजबूत होगा।