रूसी राष्ट्रपति के बयान के बाद आया डोनाल्ड ट्रंप का बयान
वाशिंगटनः अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा परमाणु हथियारों के परीक्षण को फिर से शुरू करने के संकेत ने वैश्विक कूटनीति और सुरक्षा समुदाय में एक गंभीर बहस छेड़ दी है। ट्रंप ने इस संभावित कदम को सही ठहराने के लिए रूस और चीन की बढ़ती परमाणु गतिविधियों और सैन्य आधुनिकीकरण को मुख्य कारण बताया है। यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया शीत युद्ध के बाद के परमाणु अप्रसार ढांचे को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है।
ट्रंप का यह कदम अमेरिका द्वारा 1992 से चली आ रही स्वैच्छिक परमाणु परीक्षण रोक को समाप्त कर सकता है। हालांकि अमेरिका ने कभी व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि की पुष्टि नहीं की, लेकिन 30 से अधिक वर्षों तक उसने परीक्षण से परहेज किया है। इस रोक को तोड़ने का मतलब होगा कि वैश्विक शक्ति संतुलन को बनाए रखने वाले महत्वपूर्ण मानदंडों को चुनौती देना।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका परीक्षण फिर से शुरू करता है, तो रूस और चीन, जो पहले से ही अपनी परमाणु क्षमताओं का विस्तार कर रहे हैं, को भी अपने परीक्षण कार्यक्रम शुरू करने का सीधा बहाना मिल जाएगा। इससे दुनिया तेजी से एक नई और खतरनाक परमाणु हथियारों की होड़ की ओर बढ़ सकती है, जो वैश्विक सुरक्षा के लिए अभूतपूर्व खतरा पैदा करेगी।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस घोषणा पर गहरी चिंता व्यक्त की है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य परमाणु अप्रसार संगठनों ने अमेरिका से संयम बरतने का आग्रह किया है। उनका तर्क है कि परमाणु हथियारों के परीक्षण न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्थिरता को भी कमज़ोर करते हैं।
इसके अलावा, ऐसे कदम से ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देशों को भी परमाणु क्षमता विकसित करने के अपने प्रयासों को तर्कसंगत बनाने का मौका मिलेगा। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि नई और उन्नत परमाणु तकनीक के परीक्षण के लिए यह कदम आवश्यक है ताकि अमेरिकी प्रतिरोधक क्षमता विश्वसनीय बनी रहे। यह बहस अब केवल सैन्य रणनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात पर है कि क्या दुनिया एक बार फिर से शीत युद्ध के युग की अस्थिरता की ओर जा रही है। इस निर्णय के राजनीतिक निहितार्थ भी गहरे हैं, क्योंकि यह अमेरिकी सहयोगियों को भी प्रभावित करेगा, जो परमाणु मुक्त दुनिया के प्रति वचनबद्ध हैं।