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तालिबान के नियम और भारत की संस्कृति दुविधा

भारत की राजधानी दिल्ली में अफ़गानिस्तान के तालिबान सरकार के विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुत्तकी की छह दिवसीय यात्रा और उनके प्रेस कॉन्फ्रेंस ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह यात्रा, जिसमें मुत्तकी (कंधार विमान अपहरण के समय अफ़गानिस्तान के शिक्षा मंत्री) ने भाग लिया, ऐसे समय में हुई जब भारत ने औपचारिक रूप से तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है।

हालांकि, भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ उनकी उच्च-स्तरीय बैठकें, काबुल में भारतीय दूतावास को फिर से खोलने का फैसला और भारतीय दूतावास में तालिबान प्रतिनिधि के आगमन की बात, कूटनीतिक झुकाव का स्पष्ट संकेत देती है।10 अक्टूबर, 2025 को अफ़गान दूतावास में आयोजित मुत्तकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने भारतीय लोकतंत्र और संस्कृति के मूल सिद्धांतों पर एक असहज प्रश्नचिह्न लगा दिया।

मंच के पीछे भले ही बामियान बुद्ध की प्रतीकात्मक पेंटिंग (जो 2001 में तालिबान द्वारा नष्ट कर दी गई थी) शोभा बढ़ा रही हो, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों को प्रवेश न देकर एक कठोर तालिबान प्रोटोकॉल का पालन किया गया। पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जिसका कोई लिंग नहीं होता, फिर भी उस कमरे में केवल पुरुष पत्रकार ही मौजूद थे।

किसी भी महिला पत्रकार को निमंत्रण नहीं मिला, और वे पेशेवर रूप से बाहर खड़ी होकर सवाल पूछने को मजबूर थीं। यह भारत के उस मूल्य पर सीधा हमला था जो जाति, धर्म और लिंग की परवाह किए बिना अधिकार, स्वतंत्रता और लोकतंत्र को अपनी एकता और संस्कृति का आधार मानता है। आश्चर्य की बात यह थी कि कमरे में मौजूद किसी भी भारतीय पत्रकार या अधिकारी ने इस लैंगिक भेदभाव पर सवाल नहीं उठाया।

क्या उन्होंने तालिबान के शरिया-आधारित कानून को स्वीकार कर लिया? क्या उन्हें यह याद नहीं रहा कि भारत, जहाँ बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा दिया जाता है और तीन तलाक को समाप्त करके महिलाओं की स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया जाता है, वहाँ इस तरह के अधर्म को कैसे सहन किया जा सकता है?

आलोचना के बाद, मुत्तकी को रविवार को एक और प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करनी पड़ी, जिसमें महिला पत्रकारों को आमंत्रित किया गया। यह स्पष्ट रूप से बढ़ता दबाव और डैमेज कंट्रोल का प्रयास था। सवाल यह है कि क्या भारत सरकार पहले ही यह अनुरोध नहीं कर सकती थी कि इस तरह का भेदभाव अस्वीकार्य है और यह भारतीय संस्कृति नहीं हो सकता।

किसी भी प्रोटोकॉल को, जो मानवता के मूल सिद्धांतों पर हमला करता हो, अहंकार कहना ही उचित होगा। भारत सरकार की यह सतर्कता कूटनीतिक अनिवार्यता से प्रेरित है। अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में बदलते शक्ति संतुलन को देखते हुए, भारत के लिए तालिबान सरकार के साथ संपर्क बनाए रखना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

अमेरिका और पाकिस्तान का प्रभाव: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ध्यान पश्चिम एशिया और अफ़गानिस्तान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बगराम एयरबेस को वापस पाने की ओर है। बगराम, प्राचीन सिल्क रूट की एक कुंजी है, जिसका नियंत्रण दक्षिण एशिया के हृदयस्थल पर सैन्य पहुँच सुनिश्चित करता है।

तालिबान द्वारा अमेरिका को यह ठिकाना देने से इनकार करने और पाकिस्तान द्वारा खैबर प्रांत में आईएसआई और आईएस के आतंकवादियों का इस्तेमाल करके अस्थिरता पैदा करने की कोशिश, भारत के लिए चिंता का विषय है। व्यापार और सुरक्षा: तालिबान सरकार के संपर्क में रहने से मंदी के दौर में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के रास्ते खुल सकते हैं।

साथ ही, यह पाकिस्तान पर कश्मीर के साथ-साथ खैबर की ओर से भी दबाव बनाने का एक अवसर प्रदान करता है। इससे अमेरिका के सैन्य और कूटनीतिक आक्रमण को रोकने में भी मदद मिल सकती है। हालांकि, इस कूटनीतिक लाभ के लिए, क्या भारत को अपने नैतिक सिद्धांतों से समझौता कर लेना चाहिए?

यह देश जय सियाराम (मिथिला की परंपरा में राम से पहले सीता का नाम) का है, यह देश दुर्गा का है। हम ऐसे शासक के प्रोटोकॉल को स्वीकार नहीं कर सकते, जिसका सशक्तिकरण उनके देश के लोगों को ही अस्वीकार्य है। अफ़गानिस्तान, जिसने 1919 में अमेरिका और यूरोप के कई बड़े देशों से पहले महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया था, आज महिलाओं के अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुत्तकी द्वारा चुपके से अपने बैग से तालिबानी (इस्लामिक अमीरात ऑफ़ अफ़गानिस्तान) झंडा निकालकर मेज पर रखना भी यह दर्शाता है कि उन्हें स्वयं लोकतांत्रिक अफ़गानिस्तान के दूतावास परिसर में अपने शासन को लेकर संशय है, क्योंकि बाहर अभी भी इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ अफ़गानिस्तान का झंडा लहरा रहा है। भारत को याद रखना होगा कि अधिकारों और आज़ादी के नाम पर होने वाले अन्याय को सहन करना, अपनी संस्कृति की जड़ों में गैंग्रीन पैदा करने जैसा है। लिहाजा तालिबान से कूटनीकित संपर्क तक को ठीक है उसे भारत का रोल मॉडल नहीं बनाना चाहिए।