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गुटबाजी से जूझते भाजपा और कांग्रेस का हाल बेहाल

सदन के भीतर और बाहर नजर आ रहा मतभेद

  • हेमंत की वजह से काबू हैं सभी

  • आग भड़काने में अफसर भी हैं

  • भाजपा का मतभेद सदन से बाहर

राष्ट्रीय खबर

रांचीः  गुटबाजी में कौन आगे है, इसे लेकर शायद कांग्रेस और भाजपा के बीच प्रतिस्पर्धा चल रही है। हर कदम पर इसका नजारा साफ साफ दिख जाता है। वैसे कांग्रेस की गुटबाजी से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन परेशान हैं तो भाजपा की गुटबाजी की वजह से भाजपा नेतृत्व हलाकान है। सदन के बाहर और अंदर इसे साफ साफ देखा और समझा जा सकता है।

कांग्रेस में सदन के भीतर राधाकृष्ण किशोर को लेकर पार्टी के अंदर किसी किस्म का असंतोष है। इसकी झलक कांग्रेस कार्यालय में भी दिख जाती है। वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो ने किसी तरह संगठन में सभी लोगों को एकजुट करने का काम किया तो अब विधानसभा के अंदर से दूसरी परेशानी सर उठाने लगी है।

सदन के भीतर कई मौकों पर राधाकृष्ण किशोर वनाम प्रदीप यादव और इरफान अंसारी के मतभेद सरकार को परेशानी में डालने वाले साबित हुए हैं। यह अच्छी बात है कि फिलहाल सत्ता की असली चाभी हेमंत सोरेन के पास होने की वजह से गुटबाजी में लिप्त किसी भी पक्ष को ज्यादा उछलने का मौका नहीं मिल पाया है। फिर भी सत्ता पक्ष के भीतर का ऐसा मतभेद किसी न किसी रूप में सरकार के संचालन में बाधक बन सकता है क्योंकि मौके की तलाश में बैठे अधिकारी इसी गुटबाजी को और भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे ताकि उनकी गोटी लाल होती रहे।

अब भाजपा की तरफ नजर डाले तो अपना रवैया बदलते हुए राष्ट्रीय नेतृत्व ने बाबूलाल मरांडी को विपक्ष का नेता बना दिया वरना यह चर्चा थी कि लगातार की उपेक्षा की वजह से श्री मरांडी दूसरे विकल्पों पर विचार कर रहे थे। दूसरी तरफ उड़ीसा के राज्यपाल का पद छोड़कर लौटे रघुवर दास की गाड़ी अलग चल रही है।

गिरिडीह की एक घटना में दोनों नेताओं का अलग अलग दौरा भी इसकी पुष्टि कर गया है। वैसे पहले रघुवर दास को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिये जाने की चर्चा थी लेकिन अब राष्ट्रीय राजनीति के कई फेरबदल की वजह से यह चर्चा भी मध्यम पड़ गयी है। इन दोनों नेताओं से बिल्कुल अलग चल रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा अपने प्रभाव क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं पर मुख्यालय की राजनीति से दूरी बनाकर चल रहे हैं। लिहाजा इसके पीछे की चाल को अभी समझना कठिन हो गया है। फिर भी पार्टी के भीतर कुछ लोग यह कहने से नहीं चूकते कि कहीं ऐसा ना हो कि दो की लड़ाई में असली फायदा कोई तीसरा यानी अर्जुन मुंडा को ही मिल जाए।