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चींटियों की कार्यकुशलता को देखकर रोबोटिक्स में हुआ नया कमाल

  • उनके प्राकृतिक गुणों को समझा गया था

  • यह नन्हे रोबोट भी मिलकर बड़ा काम करते हैं

  • एक फंस गया तो बाकी सारे मिलकर उसे बचाते हैं

राष्ट्रीय खबर

रांचीः हम सभी नन्ही चींटी के निरंतर काम करने की क्षमता और उनके अनुशासन से परिचित हैं। अपने घरों में, मैदान में अथवा छतों पर भी हमने उन्हें हमेशा एक ही कतार में चलते हुए देखा है। लेकिन हमलोगों में से बहुत कम लोगों को चींटियों की बस्ती की संरचना और वहां के काम काज को समझने का मौका मिला है।

चीटियों की बस्ती एक सुसंगठित निर्माण कार्य होने के साथ साथ नियमित सफाई और देखरेख का इलाका है। जमीन के अंदर अथवा कहीं और भी आम तौर पर लोगों को चीटियों की बस्ती  के अंदर के घटनाक्रमों की जानकारी नहीं मिल पाती है।

इन्हीं चींटियों के अनुशासन और साथ मिलकर काम करने की आदत ने रोबोटिक्स के वैज्ञानिकों को प्रेरित किया था। इसी प्रेरणा के आधार पर वैसे सामान्य रोबोट बनाये गये हैं जो साथ मिलकर बड़ा से बड़ा काम कर सकते हैं। चीटियों के गुणों वाले इन रोबोटों को हार्वर्ड जॉनसन ए पॉल्सन स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एंड अप्लाइड साइंसेज में बनाया गया है।

रोबोटिक्स के शोध दल ने एक साथ मिलकर काम करने वाले छोटे जानवरों पर ध्यान दिया था। इनमें चींटियों के अलावा मधुमक्खी जैसे भी प्राणी है। यह सभी एक कठोर अनुशासन के तहत आपस में मिलकर उनके आकार से मुकाबले बहुत बड़ा काम कर लेते हैं। इनमें अपनी विशाल कॉलोनियों को बनाने की भी अद्भूत प्रकृति प्रदत्ता कला है। इनकी कॉलोनियों को सामान्य किस्म की परेशानियों से कोई नुकसान ना पहुंचे, इसका भी पूरा ध्यान रखा जाता है।

इसी आधार पर शोध दल ने सामान्य किस्म के रोबोट बनाये हैं जो चींटियों की तरह आकार में छोटे होने के बाद भी एक साथ मिलकर बहुत बड़ा काम कर सकते हैं। इस बारे में शोध दल के नेता एल महादेवन ने बताया कि एक साथ काम करने वाले सामान्य किस्म के इन रोबोटों की रचना ही चींटियों के काम करने के तरीकों को देखकर की गयी है। प्रोफसर महादेवन खुद इस विधा के विशेषज्ञ हैं।

हावर्ड स्कूल के शोधकर्ता एस जी प्रसाथ ने कहा कि जिस तरीके से चींटियां भारी काम करती हैं। उसी गुण को इन रोबोटों में डाला गया है। इस काम को अंजाम देने के लिए चींटियों के आचरण का कंप्यूटर मॉडल भी तैयार किया गया ताकि यह पता चल सके कि वे काम दरअसल किस तरीके से मिलकर करते हैं।

इसे समझ लेने के बाद रोबोट चींटियों का उत्पादन हुआ है। इन्हें वैज्ञानिकों ने आरएंट्स का नाम दिया है। यह बिल्कुल चींटियों की तरह किसी कठोर सतह की खुदाई कर सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस काम के लिए चींटियां रासायनिक गंध का इस्तेमाल करती हैं जबकि इन रोबोट चींटियों को फोटोरमोंस की मदद मिलती है।

परीक्षण के दौरान इन छोटे रोबोटों को पहले से निर्देशित काम करने को कहा गया था। रोशनी के आधार पर काम करने की वजह से वे प्राकृतिक चींटियों के मुकाबल किसी भी घिरे हुए स्थान से जल्दी निकल सकते हैं।

इन रोबोटों को निर्माण, तलाश, बचाव के साथ साथ सुरक्षा के निर्देश भी दिये गये थे। इस कारण वे चींटियों की तरह ही समूह में रहते हुए इन जिम्मेदारियों को पूरा करने में सफल रहे। अच्छी बात यह रही कि जहां कोई एक ऐसा रोबोट निर्णय नहीं ले पा रहा था, वहां रोबोट दल ने मिलकर इस समस्या का समाधान तलाश लिया। इस दौरान समस्या होने तथा उसका समाधान होने का संकेत भी ये रोबोट जारी कर पूरे समूह को जानकारी देते रहते हैं। समझा जा रहा है कि इस प्रारंभिक प्रयोग के बाद बड़े पैमाने पर और कठिन परिस्थितियों के लिए भी ऐसे रोबोटों का प्रयोग होने लगेगा।