Breaking News in Hindi

दिल्ली पुलिस पर ही बार बार सवाल क्यों

लोकतंत्र की खूबसूरती उसकी सहिष्णुता, असहमतियों के प्रति सम्मान और जनता के प्रति जवाबदेही में निहित है। देश में जब भी कोई राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक मुद्दा उठता है, तो नागरिकों द्वारा विरोध प्रदर्शन करना एक स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाती है। स्वतंत्रता के बाद से ही इस देश ने अनगिनत आंदोलनों को देखा है।

आम तौर पर, लोकतांत्रिक परंपराओं में पुलिस का रवैया ऐसे प्रदर्शनों के प्रति तब तक संयमित और कानूनी दायरे में रहता है जब तक कि वे हिंसक न हों या सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था के लिए खतरा न पैदा करें। लेकिन जैसे ही कोई विरोध प्रदर्शन सरकार की नीतियों, उसकी कार्यप्रणाली या सत्ताधीशों के विरुद्ध मुखर होता है, पुलिस का आचरण अचानक से दमनकारी और जनविरोधी रूप धारण कर लेता है।

यह स्थिति इस देश की पूरी व्यवस्था पर एक बहुत बड़ा और गंभीर सवालिया निशान खड़ा करती है। जिस पुलिस बल, प्रशासनिक तंत्र और अन्य सरकारी विभागों का संचालन देश के आम नागरिकों द्वारा चुकाए जाने वाले कर (टैक्स) के पैसों से होता है, वही जनता सरकार की नजर में इतनी उपेक्षित और पराई क्यों हो जाती है?

यह विडंबना ही है कि जो शासक खुद को जनसेवक कहते हैं, वे जनता की आवाज दबाने के लिए उसी पुलिस तंत्र का इस्तेमाल करते हैं जिसे जनसुरक्षा के लिए गढ़ा गया था। हालांकि, देश के राजनीतिक परिदृश्य का एक दूसरा पहलू भी गौर करने लायक है। जिन राज्यों में हर पांच साल में राजनीतिक दलों के बदलने का स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रचलन रहा है, वहाँ की पुलिस अमूमन एक दलीय एजेंट की तरह बर्ताव करने से बचती है।

उन्हें यह अहसास रहता है कि सत्ता आज किसी की है तो कल किसी और की होगी, इसलिए उन्हें कानून और संविधान के दायरे में रहकर ही काम करना चाहिए। इसके विपरीत, जहाँ राजनीतिक स्थिरता या केंद्रीय नियंत्रण का दायरा मजबूत होता है, वहाँ पुलिस का राजनीतिकरण होने का खतरा सबसे ज्यादा बढ़ जाता है। इस संदर्भ में, अगर हालिया दौर की राष्ट्रीय राजनीति और विशेषकर दिल्ली पुलिस के कामकाज की समीक्षा की जाए, तो कई गंभीर और वैचारिक प्रश्न खड़े होते हैं।

हाल के दिनों में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के प्रत्यक्ष नियंत्रण और प्रशासनिक निर्देशन में काम करने वाली दिल्ली पुलिस बार-बार आलोचनाओं और निंदा के घेरे में आई है। स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है कि विभिन्न मामलों में सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) तक से इस बल को फटकार का सामना करना पड़ा है। ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं है कि यह पुलिस बल रातों-रात बना है या इसका कोई पुराना इतिहास नहीं है।

आज जो पुलिस बल नजर आ रहा है, यही बल पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के लंबे कार्यकाल के दौरान भी दिल्ली में कानून-व्यवस्था संभालता था। उस दौर में इस पुलिस को ‘केंद्रीय गृह मंत्री का निजी या राजनीतिक बल’ कहकर आलोचनाओं का सामना नहीं करना पड़ता था, भले ही प्रशासनिक नियंत्रण के तकनीकी पेंच केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास ही क्यों न रहे हों।

फर्क तब आना शुरू हुआ जब केंद्र और राज्य की राजनीतिक गतिशीलता में बदलाव आया। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार के अस्तित्व में आने के बाद से केंद्र की सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी के लिए उन संवैधानिक और प्रशासनिक प्रावधानों को बहुत सख्ती से लागू करना और उनका दायरा बढ़ाना जरूरी हो गया, जिनका सामान्य परिस्थितियों में अमूमन राजनीतिक उपयोग नहीं किया जाता था।

शीला दीक्षित के पूरे कार्यकाल के दौरान भी यह सवाल गाहे-बगाहे जरूर उठता था कि आखिर दिल्ली की पुलिस किसके नियंत्रण में है, क्योंकि तब भी राज्य सरकार और केंद्र के बीच समन्वय की कमी दिखती थी। लेकिन आज अमित शाह के मौजूदा राजनीतिक कार्यकाल में यही दिल्ली पुलिस जिस आक्रामक और चयनात्मक तरीके से विपक्षी आवाज़ों को कुचलने या प्रदर्शनकारियों से निपटने में आगे रहती है, वह पहले के मुकाबले काफी अलग और चिंताजनक नजर आती है।

इसलिए, यह समझना बहुत जरूरी है कि एक ही पुलिस बल, जिसके सिपाही और अधिकारी वही हैं, अलग-अलग राजनीतिक सत्ताओं के आने पर इतना अलग और पक्षपाती आचरण क्यों करने लगता है। पुलिस का यह बदला हुआ चरित्र इस बात का प्रमाण है कि जब लोकतंत्र में संस्थाओं की स्वायत्तता को कमजोर करके उन्हें राजनीतिक प्राथमिकताओं के अधीन कर दिया जाता है, तब न्याय और निष्पक्षता पीछे छूट जाती है। यदि जनता के पैसों से चलने वाली पुलिस सत्ता के इशारों पर काम करने लगेगी, तो लोकतंत्र और तानाशाही के बीच की बारीक रेखा धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी। जरूरत इस बात की है कि पुलिस प्रशासन को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाए ताकि वह किसी दल विशेष की नहीं, बल्कि भारत के संविधान और यहाँ के आम नागरिकों के अधिकारों की सच्ची रक्षा कर सके।