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अब भी निजी सोच से ऊपर नहीं है इंडिया गठबंधन

भारत कभी-कभी बहुत अजीब लग सकता है, लेकिन इंडिया गठबंधन उससे भी अधिक विचित्र तरीके से काम कर सकता है। आखिरकार, देश की मुख्य विपक्षी ताकत अपनी ही आंतरिक सीमाओं और कमियों के कारण सरकार की तमाम नीतिगत चूकों और विफलताओं के खिलाफ जनमत जुटाने में कई बार बुरी तरह असफल रही है।

आपसी फूट और बिखराव ने भी विपक्षी खेमे को हमेशा कमजोर किया है। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगे अनियमितता और कदाचार के गंभीर आरोपों ने अब एक मृतप्राय विपक्ष को लोकतंत्र की रक्षा के लिए खुद को पुनर्जीवित करने का एक नया अवसर प्रदान किया है। विपक्ष के भीतर आपसी मतभेदों को भुलाकर मेल-मिलाप और समझौते करने के कई दिलचस्प प्रयास देखने को मिले हैं।

इनमें से सबसे दिलचस्प बात भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच बढ़ती राजनीतिक नजदीकियां हैं। सीपीएम के महासचिव एम. ए. बेबी ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए के दायरे से बाहर के कई दलों के नेताओं को पत्र भेजे। बंगाल में सीपीएम की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानी जाने वाली ममता बनर्जी ने इस पहल का सकारात्मक और खुला जवाब दिया।

इसके अलावा, एम. ए. बेबी ने अरविंद केजरीवाल से भी मुलाकात की थी, और इंडिया गठबंधन की एक बैठक भी निर्धारित की गई है।  एक एकजुट विपक्ष स्वाभाविक रूप से दबाव में घिरे मुख्य चुनाव आयुक्त पर भारी दबाव बना सकता है। यदि यह विपक्षी गठबंधन अपने चुनावी गणित को सही ढंग से साध ले, तो यह बीजेपी के लिए एक कड़ी चुनावी चुनौती भी पेश कर सकता है।

भारतीय राजनीति में हमेशा से अजीबोगरीब राजनीतिक साझेदारियां देखने को मिलती रही हैं; उदाहरण के लिए, साल 2016 में पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी रही सीपीएम और कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल के चुनावों में ममता बनर्जी की पार्टी के खिलाफ एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। हालांकि, विपक्षी एकजुटता के इस रास्ते में कई महत्वपूर्ण और बड़ी बाधाएं भी मौजूद हैं।

सबसे पहली और मुख्य बात यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर आपसी सहयोग अक्सर क्षेत्रीय स्तर की वर्चस्व की लड़ाइयों और गठबंधन के सहयोगियों के बीच मौजूद आपसी संशय व आरक्षण के कारण कमजोर पड़ जाता है। उदाहरण के लिए, क्या पश्चिम बंगाल में सीपीएम की अपनी स्थानीय इकाई ममता बनर्जी के साथ मिलकर लड़ने के लिए आसानी से तैयार हो जाएगी, जिन्होंने राज्य में वाम मोर्चे को सत्ता से बेदखल किया था?

यही कारण है कि बंगाल के नेता शुभेंदु अधिकारी ने इस पुराने राजनीतिक इतिहास और आपसी कड़वाहट का मुद्दा उठाया है। इसी तरह की कड़वाहट कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) के संबंधों के बीच और अब कांग्रेस तथा द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम के रिश्तों में भी साफ देखी जा सकती है। तमिलनाडु में विजय की सरकार को समर्थन देने के फैसले ने डीएमके को नाराज कर दिया है। अब वह भाजपा के खिलाफ होने का दावा करने के बाद भी अपने राज्य में अपने वोट बैंक की चिंता में हैं।

ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि भाजपा का तमिलनाडु की राजनीति में बहुत कम प्रभाव है। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दिल्ली एवं पंजाब में एक दूसरे के वोट बैंक पर सेंधमारी में जुटे हैं। लिहाजा उनके बीच वैचारिक द्वंद्व कायम है। इसके सामने एक अतिरिक्त चुनौती भी खड़ी है।

आम जनता की नजरों में, विशेष रूप से युवा मतदाताओं के बीच, एक गैर-राजनीतिक संगठन होने के बावजूद कुछ अन्य तत्व या वैकल्पिक मंच अधिक रचनात्मक रूप से मुद्दों को उठाते नजर आ रहे हैं और तीखे सवाल पूछ रहे हैं—जबकि देश की जनता इन पिछले तमाम वर्षों से विपक्ष से ही इस तरह की मुखरता की उम्मीद करती रही है।

यही कारण है कि पिछले 12 वर्षों में विपक्ष कई मौकों पर जनता के असंतोष को मतों में सफलतापूर्वक परिवर्तित नहीं कर पाया है। इसके बावजूद, अपनी खोई हुई ताकत और प्रभावशीलता को फिर से हासिल करने का इंडिया गठबंधन का यह नया प्रयास बेहद उत्साहजनक है। कोई भी मजबूत और जीवंत लोकतंत्र अपने असंतुष्टों और विरोध के स्वरों के बिना जीवित नहीं रह सकता। सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले और सत्ता से सवाल पूछने वाले इन स्वरों का बने रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था की सेहत के लिए अत्यंत आवश्यक है।

जब कभी किसी बड़ी चुनौती का मौका आता है तो अचानक इंडिया गठबंधन का कोई न कोई खेमा छिटक कर दूर चला जाता है। दरअसल जो दल प्रदेश स्तरीय अपनी पकड़ को लेकर संतुष्ट हैं, वे राष्ट्रीय फलक पर बड़ी सोच नहीं रख पाते। लेकिन यह भी तय है कि कभी न कभी उनकी स्थिति में अचानक से टीएमसी जैसी हो सकती है, जिसने अभी एक नहीं दो दो विभाजन झेला है। दोनों ही विभाजन के पीछे भाजपा का हाथ है। दरअसल ममता को भी अपने राज्य में कोई खतरा नहीं होने की गलतफहमी थी, जो अब दूर हो चुकी है।