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अब बातों की सफाई नहीं, कुर्सी की सफाई हो

भारतीय लोकतंत्र इस समय अपने इतिहास के सबसे संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। व्यवस्था की धमकियों और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर मंडराते खतरों के बीच हाल ही में मुख्य चुनाव आयोग के भीतर से उठी असहमति की सुगबुगाहट ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। प्रतिष्ठित समाचार पत्र द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों के फैसलों और कार्यप्रणाली पर गंभीर मतभेद हैं।

हैरान करने वाली बात यह है कि चुनाव आयोग की ओर से इन खबरों का कोई आधिकारिक खंडन नहीं आया। आयोग की तरफ से केवल यह कहकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की गई कि किसी भी विभाग या संस्था में मतभिन्नता एक सामान्य प्रक्रिया है। यह तर्क अपने आप में हास्यास्पद और लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है। यदि प्रशासनिक इकाइयों में मतभिन्नता सामान्य है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में बहुमत का फैसला सर्वोपरि माना जाता है।

चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय में, जहां तीन प्रमुख आयुक्तों की मौजूदगी होती है, वहां यदि गंभीर असहमति थी, तो बहुमत के आधार पर फैसला क्यों नहीं लागू किया गया? इस अंदरूनी कलह और मतभेद के बाहर आने का समय भी बहुत कुछ कहता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार का नौकरशाही पर शिकंजा अब धीरे-धीरे ढीला पड़ रहा है। इतिहास गवाह है कि जब कोई राजनीतिक जहाज डूबने की कगार पर पहुंचता है, तो सबसे पहले मलाई खाने वाले और चाटुकारिता करने वाले लोग ही अपनी जान बचाने के लिए उससे छलांग लगाते हैं।

ब्यूरोक्रेसी के भीतर भी अब ऐसे समझदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी मौजूद हैं, जो भविष्य में किसी बड़े कानूनी झमेले या संवैधानिक संकट में फंसने से बचने के लिए अभी से अपनी स्थिति स्पष्ट करना चाहते हैं। इससे यह भी साबित होता है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर अतीत में जो गंभीर संदेह व्यक्त किए गए थे, वे पूरी तरह निराधार नहीं थे। उस समय शायद हमारे पास तकनीकी सबूतों या दस्तावेजों का अभाव था, लेकिन पिछले कुछ चुनावों के दौरान आए नतीजों और जमीन पर मौजूद वास्तविक हकीकत का जो भारी अंतर था, वह हर आम नागरिक की आंखों में खटक रहा था।

अब सारा दारोमदार देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट पर आ टिका है। भारतीय लोकतंत्र और संविधान को बचाने के लिए अब न्यायपालिका को आगे आकर कड़ा और साहसिक कदम उठाना होगा। हर बार तारीख पर तारीख देकर मामलों को लंबित कर देना या टाल देना लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए किसी भी1 तरह से शुभ संकेत नहीं है। यह घटना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की राजनीतिक किलेबंदी में अब बड़ी दरारें पड़ने लगी हैं।

आने वाले समय में यह दरारें अन्य सरकारी महकमों और संस्थानों में भी साफ दिखाई देंगी। ब्यूरोक्रेसी के भीतर अभी भी ऐसे अनगिनत ईमानदार लोग हैं जो भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान में गहरी आस्था रखते हैं। वर्तमान सत्ता की तानाशाही गतिविधियों से वे भीतर ही भीतर बेहद खिन्न और आहत हैं। व्यवस्था और नौकरी के शिकंजे में बंधे होने के कारण भले ही ऐसे लोग खुलकर सामने न आ रहे हों और चुप्पी साधे बैठे हों, लेकिन वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि देश किस खतरनाक दिशा में धकेला जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में हुई एक सुनवाई के दौरान एक न्यायाधीश ने बहुत ही सटीक टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की वर्तमान प्रक्रिया कुछ ऐसी है मानो क्रिकेट मैच खेलने वाली टीम ही खुद अपने मुकाबले के लिए अंपायर का चुनाव कर रही हो। गौरतलब है कि पहले देश के मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। लेकिन मोदी सरकार ने सुनियोजित तरीके से कानून में संशोधन कर सीजेआई को इस चयन समिति से बाहर कर दिया और उनकी जगह अपने मंत्रिमंडल के एक सहयोगी मंत्री को शामिल कर लिया।

इसका एकमात्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि चयन प्रक्रिया पर पूरी तरह सरकार का नियंत्रण रहे और बहुमत का फैसला हमेशा उनके अनुकूल हो। इसी तर्ज पर, अब चुनाव आयोग के भीतर भी लोकतंत्र और निष्पक्षता को जिंदा रखने के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को तत्काल हटाया जाए। जब तक इस सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति की निष्पक्षता संदिग्ध रहेगी, तब तक इस कुर्सी की गरिमा बहाल नहीं हो सकती। अब समय आ गया है कि बातों की सफाई देने के बजाय इस कुर्सी की और इसके पूरे तंत्र की मुकम्मल सफाई की जाए, ताकि देश की लोकतांत्रिक आस्था बची रह सके।