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पाकिस्तान की दोहरी भूमिका पर पश्चिमी देशों में उठ रहे सवाल

चीन से ईरान को हथियार उसके जरिए पहुंच रहा

ओटावाः एक हालिया रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान पाकिस्तान के उन दावों पर गंभीर सवालिया निशान लग गए हैं, जिनमें वह खुद को एक ईमानदार मध्यस्थ या शांतिदूत के रूप में पेश करता रहा है। कनाडा स्थित जियोपॉलिटिकल मॉनिटर की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के रास्ते चीन से ईरान तक हथियारों की आवाजाही ने वाशिंगटन को इस बात पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है कि क्या इस्लामाबाद वास्तव में ईरान युद्ध में एक तटस्थ मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है या नहीं।

रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि 300 से 400 चीनी वायु-रक्षा प्रणालियों (एयर-डिफेंस सिस्टम), जिनकी कीमत लगभग 70 मिलियन डॉलर है, का कथित हस्तांतरण इस बात का ताजा प्रमाण है कि पाकिस्तान की निष्पक्षता के दावे खोखले हैं। मध्य पूर्व में शत्रुता भड़कने से बहुत पहले ही इस्लामाबाद के शांतिदूत वाले दावों को उसकी अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा प्रतिबद्धताओं और तेहरान के साथ हालिया तनाव के बीच सही साबित करना मुश्किल हो रहा था। इसके अलावा, पड़ोसी देश अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान का अपना संघर्ष भी इसमें शामिल है।

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि ईरान को चीनी हथियारों की खेप पहुँचाने का जरिया बनना सबसे बड़ा विरोधाभास है। इस प्रकार की सहायता से न केवल ईरान की सैन्य क्षमताओं को बढ़ावा मिलता है, बल्कि उस युद्ध को भी लंबा खींचने में मदद मिलती है जिसे समाप्त करने का दावा पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य नेता कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, एक तरफ पाकिस्तान संघर्षविराम कराने का प्रयास कर रहा था, तो दूसरी तरफ उसने कथित तौर पर ईरानी सैन्य विमानों को पाकिस्तानी वायु सेना के नूर खान बेस पर शरण दी। हालांकि, इस्लामाबाद ने इस आरोप से इनकार करते हुए दावा किया कि ये विमान अमेरिका के साथ शांति वार्ताओं में शामिल राजनयिक कर्मियों को ला रहे थे, लेकिन यह स्पष्टीकरण संदिग्ध बना हुआ है।

इसके अलावा, रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि अपनी शांति-स्थापना पहलों के बदले में इस्लामाबाद ने वाशिंगटन से अतिरिक्त 10 अरब डॉलर की सहायता की मांग की है, जबकि उसके प्रयास कोई दीर्घकालिक समाधान हासिल करने में विफल रहे हैं। पाकिस्तानी अधिकारियों ने अमेरिकी ट्रेजरी के एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन फंड से इन फंडों का आधिकारिक अनुरोध किया था। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान के कदमों के पीछे की मुख्य प्रेरणा क्षेत्रीय स्थिरता के प्रति प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक लाभ हासिल करने की लालसा रही है।