सुप्रीम कोर्ट ने कहा दंडित करने का अधिकार नहीं
दो पूर्व छात्रों ने दायर की थी याचिका
कानून के तहत बीसीआई को अधिकार नहीं
बीसीआई ने अपनी तरफ से सफाई पेश की
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने घोषित किया है कि भारतीय बार काउंसिल के पास कानून के छात्रों के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक या दंडात्मक कार्रवाई शुरू करने का अधिकार या क्षेत्र क्षेत्राधिकार नहीं है। अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत इसकी अनुशासनात्मक शक्तियां केवल पंजीकृत अधिवक्ताओं (रजिस्टर्ड वकीलों) तक ही सीमित हैं।
सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश नालसार के दो पूर्व स्नातकों द्वारा दायर एक याचिका पर आया है। इस याचिका में बार काउंसिल ऑफ इंडिया और उसके अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की गई थी। दरअसल, बीसीआई ने 2026 बैच के छात्रों द्वारा अपने दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश को मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध करने पर, उनके पेशेवर नामांकन पर रोक लगाने का प्रयास किया था, जिसे बाद में वापस ले लिया गया था।
याचिका में कहा गया था कि बीसीआई के पत्रों ने छात्रों के बीच वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा संगठन बनाने की स्वतंत्रता पर नकारात्मक असर डाला। अदालत में उपस्थित हुए श्री मिश्रा ने कहा कि नालसार को भेजे गए पत्र—जिसमें छात्रों के खिलाफ जांच के निर्देश दिए गए थे—और राज्य बार काउंसिलों को जारी किए गए निर्देश—जिसमें छात्रों को वकील के रूप में नामांकित होने से रोककर दंडित करने की बात कही गई थी—तत्काल प्रभाव से वापस ले लिए गए थे। उन्होंने कहा कि अब कार्रवाई का कोई कारण शेष नहीं बचा है। इसके बाद अदालत ने उन पत्रों को निष्प्रभावी और निरस्त घोषित कर दिया।