‘खिलाड़ी देश का होता है, राज्य का नहीं’; ग्रेडेशन न मिलने पर पंजाब-हरियाणा के CM से मिलेंगे नेशनल प्लेयर दिनेश
सिरसा (हरियाणा): राष्ट्रीय स्तर की कई खेल प्रतियोगिताओं में देश व प्रदेश के लिए पदक जीत चुके होनहार खिलाड़ी दिनेश घणघस आज अपनी खेल उपलब्धियों से ज्यादा प्रशासनिक और सरकारी फाइलों की बेरुखी की वजह से चर्चा में हैं।
मूल रूप से पंजाब के मानसा जिले के गांव झंडा खुर्द निवासी दिनेश पिछले करीब 15 वर्षों से ‘खेल ग्रेडेशन प्रमाणपत्र’ (Sports Gradation Certificate) हासिल करने के लिए पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों के खेल विभागों के चक्कर काट रहे हैं। इस महत्वपूर्ण ग्रेडेशन सर्टिफिकेट के न मिलने के कारण उन्हें खेल कोटे से मिलने वाली कई सरकारी नौकरियों के सुनहरे अवसरों को भी हाथ से गंवाना पड़ा है।
🤼 डोमिसाइल पंजाब का और मैदान हरियाणा का, यही बनी सबसे बड़ी प्रशासनिक बाधा
दिनेश घणघस का जन्म और शुरुआती प्राथमिक शिक्षा पंजाब के मानसा जिले में हुई थी। कक्षा 8वीं तक पढ़ाई करने के बाद वे हरियाणा के सिरसा आ गए और 12वीं तक की शिक्षा यहीं प्राप्त की।
वर्ष 2006 से लेकर 2013 तक उन्होंने हरियाणा के सिरसा स्थित भगत सिंह स्टेडियम में नियमित अभ्यास किया और एथलेटिक्स/खेल प्रतियोगिताओं में आधिकारिक रूप से हरियाणा राज्य का प्रतिनिधित्व किया। अब यही तकनीकी तथ्य उनके लिए सबसे बड़ी प्रशासनिक रुकावट बन गया है; पंजाब उन्हें दूसरे राज्य से खेलने के कारण और हरियाणा उन्हें पंजाब का डोमिसाइल (अधिवास) होने के कारण सर्टिफिकेट देने से कतरा रहा है।
🗣️ “15 साल से सिर्फ अफसरों की चौखट नाप रहा हूं, मेडल के बावजूद हक नहीं मिला”: दिनेश घणघस
अपनी आपबीती सुनाते हुए राष्ट्रीय खिलाड़ी दिनेश घणघस ने कहा, “मैं पिछले 15 साल से पंजाब और हरियाणा के खेल दफ्तरों की चौखट नाप रहा हूं। हर बार कोई नया नियम, तकनीकी पेंच या नई आपत्ति बताकर मुझे ग्रेडेशन देने से मना कर दिया जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए मेडल जीतने के बावजूद आज तक मुझे मेरा वाजिब अधिकार नहीं मिला। मेरे पास पंजाब का स्थायी डोमिसाइल है, लेकिन मैंने अपनी खेल ट्रेनिंग और प्रतियोगिताएं हरियाणा से पूरी कीं। अब दोनों राज्य एक-दूसरे के पाले में गेंद डालकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं और मेरी फाइल वर्षों से धूल फांक रही है।”
💼 हाथ से निकले सरकारी नौकरी के कई मौके, उम्र सीमा भी हो रही पार
ग्रेडेशन प्रमाणपत्र न मिल पाने का सीधा और सबसे घातक असर दिनेश के पूरे करियर और जीवन पर पड़ा है।
दिनेश कहते हैं, “खेल कोटे के तहत निकलने वाली ढेरों सरकारी भर्तियों में आवेदन करने का मौका सिर्फ इसलिए मेरे हाथ से निकल गया क्योंकि मेरे पास खेल विभाग द्वारा जारी ग्रेडेशन सर्टिफिकेट नहीं था। जिस उम्र में मुझे अपनी उपलब्धियों के दम पर एक सम्मानित नौकरी में होना चाहिए था, उस उम्र में मैं अधिकारियों के कमरों के चक्कर काट रहा हूं। सालों की हाड़-तोड़ मेहनत, राष्ट्रीय उपलब्धियां और सीने पर सजे मेडल होने के बावजूद मुझे वह सम्मान और अधिकार नहीं मिला, जिसका मैं पात्र हूं।”
🏛️ पंजाब-हरियाणा के मुख्यमंत्रियों और खेल मंत्रियों से मिलकर उठाएंगे खिलाड़ियों के हक की आवाज
प्रशासनिक उपेक्षा से हताश दिनेश घणघस ने आगे कहा, “अब मैं जल्द ही पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों के माननीय मुख्यमंत्रियों और खेल मंत्रियों से व्यक्तिगत रूप से मिलकर अपनी समस्या रखूंगा। मैं चाहता हूं कि दोनों राज्य सरकारें अंतर-राज्यीय खिलाड़ियों के लिए एक पारदर्शी और स्पष्ट नीति बनाएं, ताकि भविष्य में किसी भी युवा खिलाड़ी को मेरी तरह वर्षों तक भटकना न पड़े। यह सिर्फ मेरी व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है, बल्कि उन तमाम खिलाड़ियों का मुद्दा है जो लालफीताशाही और प्रशासनिक पेंच में फंसकर अपना भविष्य बर्बाद कर लेते हैं।”
📷 अधिकारियों ने कैमरे के सामने बोलने से किया साफ इनकार, नीतिगत मजबूरी का दिया हवाला
इस पूरे गंभीर मामले में जब सिरसा के जिला खेल अधिकारी जगदीप कुमार से बात करने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने कैमरे के सामने कोई भी आधिकारिक टिप्पणी करने से साफ इनकार कर दिया। हालांकि, खिलाड़ी दिनेश के अनुसार लिखित पत्राचार में उन्हें ग्रेडेशन न दिए जाने की बात स्वीकार की गई है।
दूसरी ओर, पंजाब के मानसा जिला खेल अधिकारियों ने भी इस मामले में खेल नीति के मौजूदा नियमों की तकनीकी मजबूरी का हवाला देकर हाथ खड़े कर दिए हैं।
📜 खेल नीति की निष्पक्षता पर उठे गंभीर सवाल, क्या खिलाड़ियों के लिए तय होगी राज्य की सीमा?
दिनेश का तर्क है कि, “पंजाब की खेल नीति 2010 के नियम 4.1 के अनुसार ग्रेडेशन डोमिसाइल के आधार पर दिया जाना चाहिए। मेरा सवाल यह है कि यदि हरियाणा राज्य अपने डोमिसाइल खिलाड़ियों को दूसरे राज्यों से खेलने के बावजूद ग्रेडेशन का लाभ दे सकता है, तो पंजाब के खिलाड़ियों के साथ यह भेदभाव क्यों? एक खिलाड़ी देश के लिए खेलता है, किसी राज्य विशेष की सीमा के लिए नहीं। जब सरकारी नौकरी के लिए डोमिसाइल मान्य हो सकता है, तो खेल ग्रेडेशन में राज्य की सीमा आड़े क्यों आती है?”
उल्लेखनीय है कि दिनेश घणघस का यह मामला अब केवल एक खिलाड़ी का व्यक्तिगत दर्द नहीं है, बल्कि यह देश की खेल नीतियों, जटिल प्रशासनिक व्यवस्था और खिलाड़ियों के बुनियादी अधिकारों से जुड़ा एक बड़ा सवाल बन चुका है। खेल विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि राष्ट्रीय स्तर के पदक विजेता को अपने अधिकारों के लिए दशकों तक संघर्ष करना पड़े, तो राज्यों को अपनी खेल नीतियों पर नए सिरे से पुनर्विचार करने की सख्त जरूरत है।