साडा हक, इत्थे रख… — फिल्म रॉकस्टार का यह मशहूर गीत सिर्फ एक फिल्मी धुन नहीं, बल्कि भारतीय जन-चेतना में दबा हुआ वह आक्रोश है जो समय-समय पर व्यवस्था के खिलाफ विस्फोट बनकर फूटता है। मोहित चौहान की गरजती आवाज और ए.आर. रहमान के शक्तिशाली संगीत से सजा यह गीत सत्ता, तंत्र और तानाशाही रवैये के मुंह पर करारा तमाचा मारता है। आज देश में जिस प्रकार की राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल देखने को मिल रही है, उसने इस गीत की प्रासंगिकता को एक नए शिखर पर पहुंचा दिया है।
हालिया महीनों में देश के राजनीतिक परिदृश्य में एक अभूतपूर्व मोड़ आया है। कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा शुरू किए गए बड़े पैमाने के जनांदोलन ने देश की सत्ता की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है। एक समय जिसे हाशिए पर पड़ा हुआ या महज एक छोटा विरोध प्रदर्शन माना जा रहा था, उसने देखते ही देखते एक राष्ट्रव्यापी लहर का रूप ले लिया। यह आंदोलन देश के युवाओं, किसानों, मजदूरों और आम नागरिकों के संचित असंतोष का परिणाम है, जो लंबे समय से दमनकारी नीतियों और अनदेखी से पीड़ित महसूस कर रहे थे।
कॉकरोच जनता पार्टी के इस उग्र आंदोलन ने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। देश के अलग-अलग हिस्सों—चाहे वह उत्तर भारत के ग्रामीण इलाके हों या दक्षिण के औद्योगिकीकृत शहर—से भाजपा नेताओं के खिलाफ जनता का गुस्सा खुलकर सामने आ रहा है। कई राज्यों में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और जन प्रतिनिधियों को भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। जनसभाओं के दौरान काले झंडे दिखाना, घेराव करना और कहीं-कहीं उग्र झड़पों व हमलों की खबरें सामने आना यह दर्शाती हैं कि जनता का धैर्य अब जवाब दे चुका है। नेताओं के लिए अपने ही क्षेत्रों में जाकर संवाद स्थापित करना अब बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है।
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि सत्ता के प्रति जनता का यह गुस्सा अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि यह उसी कुंठा का नतीजा है जिसे दबाने की कोशिश लंबे समय से की जा रही थी। इस माहौल में रॉकस्टार का वह प्रसिद्ध गीत इस पूरे परिदृश्य की एक सटीक संगीतमय अभिव्यक्ति बन जाता है।
साडा हक इत्थे रख
ना ना ना… ना ना ना…
साडा हक, इत्थे रख साडा हक, इत्थे रख
साडा हक, इत्थे रख साडा हक, इत्थे रख
इको-फ्रेंडली, नेचर-फ्रेंडली योर बिहेवियर
इज नॉट फ्रेंडली इको-फ्रेंडली,
नेचर-फ्रेंडली योर बिहेवियर इज नॉट फ्रेंडली
ओ री कागा, कागा रे कागा रे मोरी
इतनी अरज तोसे चुन-चुन खाइयो मांस
अरज तोसे चुन-चुन खाइयो मांस खाइयो
ना तू नैना मोरे, खाइयो ना तू नैना
मोरे पिया के मिलन की आस…
पिया के मिलन की आस…
साडा हक, इत्थे रख साडा हक,
इत्थे रख साडा हक, इत्थे रख साडा हक, इत्थे रख
तुम अंदर से कुछ और, बाहर से कुछ और
नजर आते हो तुम हंसते-हंसते लोगों को
बेवकूफ बनाते हो
जो चाहा वो छीन लिया,
जो चाहा वो तोड़ दिया
हमको क्या समझे हो? क्या समझे हो तुम?
साडा हक, इत्थे रख साडा हक, इत्थे रख
साडा हक, इत्थे रख साडा हक, इत्थे रख!
इस गीत की हर एक पंक्ति—विशेष रूप से तुम अंदर से कुछ और, बाहर से कुछ और नजर आते हो—मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व के दोहरे रवैये पर सीधा प्रहार करती है।
कॉकरोच जनता पार्टी के इस आंदोलन और देशव्यापी असंतोष का सबसे ऐतिहासिक और चौंकाने वाला पहलू वह क्षण रहा, जब देश के इतिहास में पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी राजनीतिक रणनीति से पीछे हटना पड़ा। अपने सख्त फैसलों और अड़े रहने की छवि के लिए जाने जाने वाले प्रधानमंत्री मोदी का इस तरह जन-दबाव के आगे झुकना और कदम पीछे खींचना भारतीय राजनीति की एक अभूतपूर्व घटना है।
इसे न केवल आंदोलनकारियों की बहुत बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि लोकतंत्र में जनभावनाओं की अनदेखी एक सीमा से अधिक नहीं की जा सकती। दूसरी तरफ भड़की हुई पब्लिक के उग्र तेवर सोशल मीडिया पर भाजपा के नेता भी देख रहे होंगे, जिन्हें इससे झंडा लगाकर चलने में सावधान होने की जरूरत है।
नहीं तो क्या पता किस चौराहे पर खड़ी युवाओं की भीड़ उनकी अचानक पूजा प्रारंभ कर दें। होशियार रहिएगा हुजूर। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि जब जनता अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर खड़ी होती है, तो बड़े से बड़ा राजनीतिक तंत्र भी झुकने पर मजबूर हो जाता है। साडा हक इत्थे रख केवल एक गाना बनकर नहीं रह गया है, बल्कि यह हर उस नागरिक का नारा बन चुका है जो अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और स्वाभिमान की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरने का साहस रखता है।