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जलस्रोतों से तेजी से खत्म हो रहा है ऑक्सीजन, देखें वीडियो

वैज्ञानिकों ने पूरी दुनिया को नये खतरे की चेतावनी दी

  • हर जलीय ढांचे का अध्ययन किया गया

  • सभी में इसका घटता स्तर पाया गया है

  • पूरे खाद्य श्रृंखला पर गंभीर संकट होगा

राष्ट्रीय खबर

रांचीः यूसी सैन डिएगो के स्क्रिप्स इंस्टीट्यूशन ऑफ ओशनोग्राफी के नेतृत्व में शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों ने चेतावनी जारी की है कि महासागरों, तटीय जल, नदियों, झीलों और धाराओं जैसे मीठे पानी के तंत्रों से ऑक्सीजन तेजी से गायब हो रही है। जलीय ऑक्सीजन की इस गंभीर कमी के कारण हमारी पृथ्वी एक बेहद असुरक्षित और खतरनाक स्थिति की ओर बढ़ रही है। ज्ञानिकों का मानना है कि इसके परिणामस्वरूप होने वाले कुछ परिवर्तन आने वाली कई शताब्दियों तक बने रह सकते हैं, जिन्हें मानव जीवनकाल के भीतर ठीक कर पाना लगभग असंभव होगा।

हाल ही में प्रकाशित एक नए शोध समीक्षा पत्र में विशेषज्ञों ने महासागरों, तटीय क्षेत्रों, झीलों और नदियों में घटते हुए घुलनशील ऑक्सीजन के स्तर की गहन समीक्षा की है। शोधकर्ताओं ने इस बात का बारीकी से आकलन किया कि यह बढ़ती हुई समस्या प्लेनेटरी बाउंड्रीज ढांचे में शामिल पृथ्वी की नौ प्रमुख प्रणालियों के साथ किस प्रकार परस्पर प्रभाव डालती है।

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वर्ष 2009 में स्थापित किया गया प्लेनेटरी बाउंड्रीज ढांचा उन पर्यावरणीय प्रक्रियाओं की पहचान करता है, जो पृथ्वी को स्थिर और सुरक्षित बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं। यह ढांचा इस बात पर भी नज़र रखता है कि मानवीय गतिविधियां इन प्रणालियों को सुरक्षित सीमाओं से बाहर कैसे धकेल रही हैं। वर्तमान में इसमें नौ सीमाएं शामिल हैं: जलवायु परिवर्तन, महासागरीय अम्लीकरण, जैव विविधता का नुकसान, वायुमंडलीय एयरोसोल लोडिंग, समताप मंडलीय ओजोन क्षरण, मीठे पानी में परिवर्तन, भूमि-उपयोग में परिवर्तन, रासायनिक प्रदूषण और जैव-भू-रासायनिक प्रवाह (नाइट्रोजन चक्र सहित)। शोधकर्ताओं का पुरजोर तर्क है कि जल में घुलनशील ऑक्सीजन के स्तर को भी इस प्लेनेटरी बाउंड्रीज ढांचे में औपचारिक रूप से शामिल किया जाना चाहिए।

यूसी सांता बारबरा के नेशनल सेंटर फॉर इकोलॉजिकल एनालिसिस एंड सिंथेसिस की पोस्टडॉक्टोरल स्कॉलर और अध्ययन की मुख्य लेखिका एरिका फेरर ने कहा, हमारी पृथ्वी का स्वास्थ्य और स्थिरता पूरी तरह से जलीय पारिस्थितिक तंत्रों के स्वास्थ्य और स्थिरता पर निर्भर करती है, जिन्हें सामान्य रूप से कार्य करने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। यह अध्ययन जलीय ऑक्सीजन की कमी को एक वैश्विक खतरे के रूप में उभारने और यह दर्शाने के लिए तैयार किया गया है कि यह समस्या अलग-थलग होकर काम नहीं करती।

मानव निर्मित गतिविधियों के कारण बढ़ता तापमान (ग्लोबल वार्मिंग), अत्यधिक पोषक तत्व प्रदूषण और गहरे पानी के प्रवाह तथा वेंटिलेशन में आने वाले बदलाव जलीय ऑक्सीजन की कमी के मुख्य कारक हैं। जैसे-जैसे पानी में ऑक्सीजन का स्तर गिरता है, यह पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित करने वाली जैविक और रासायनिक प्रक्रियाओं को बाधित करता है। यह गिरावट सूक्ष्मजीवों से लेकर मछलियों और शार्क तक पूरे जलीय खाद्य जाल के लिए बड़ा खतरा बन रही है। यहां तक कि समुद्री स्तनधारी जीव, जो सतह पर हवा से सांस लेते हैं, वे भी इससे प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि ऑक्सीजन की कमी उनके शिकार की संख्या घटा देती है, उनके प्राकृतिक आवासों को नष्ट करती है और खाद्य श्रृंखला को बिगाड़ देती है।

शोधकर्ता एरिका फेरर और वरिष्ठ लेखिका लिसा लेविन ने 2019 में मैड्रिड में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के दौरान इस अध्ययन का विचार विकसित किया था। उन्हें उम्मीद है कि यह अध्ययन नीति निर्माताओं को ऑक्सीजन की कमी की समस्या को जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण से जोड़कर देखने के लिए प्रेरित करेगा।

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