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Bhopal News: दूसरों की जान बचाने वाले गोताखोर खुद आर्थिक तंगी के शिकार, ₹10 हजार वेतन में परिवार चलाना मुश्किल

राजधानी भोपाल की झीलों और तालाबों में जब भी कोई हादसा होता है, तो नगर निगम के ये जांबाज गोताखोर अपनी जान की परवाह किए बिना पानी में कूद पड़ते हैं। सैकड़ों लोगों को मौत के मुंह से खींचकर बाहर निकालने वाले ये गोताखोर आज खुद आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर रहे हैं। आलम यह है कि दूसरों की जान बचाने वालों के परिवार का भरण-पोषण करना ही एक बड़ी चुनौती बन गया है।

💰 मात्र ₹10 हजार में परिवार चलाना मुश्किल

गोताखोर फैज उल्ला, आसिफ खान और मजहर ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि उन्हें नगर निगम से मात्र 10 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता है। आज की महंगाई में बच्चों की पढ़ाई, इलाज और अन्य जरूरी खर्चे पूरा करना नामुमकिन सा हो गया है। उन्होंने कहा कि जिन हाथों ने अनगिनत जानें बचाईं, आज वे हाथ सम्मान और उचित वेतन के लिए तरस रहे हैं।

👮 पुलिस और प्रशासन से सहयोग की कमी का दर्द

गोताखोर दुर्गा ने पुलिस के रवैये पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा, “जब हम किसी की जान बचाकर थाने ले जाते हैं, तो पुलिस का सहयोग नहीं मिलता। ऊपर से कई बार व्यंग्य सुनने पड़ते हैं।” वहीं, 12 साल से कार्यरत आसिफ खान और मजहर का कहना है कि उन्हें अब तक नियमित नहीं किया गया है। गणेश और दुर्गा विसर्जन जैसे आयोजनों में उन्हें 24-24 घंटे ड्यूटी करनी पड़ती है, लेकिन उसका कोई ओवर-टाइम भत्ता भी नहीं दिया जाता।

🗣️ क्या है नगर निगम का रुख?

इस मामले पर भोपाल नगर निगम की महापौर मालती राय ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा:

“नगर निगम अपने हर कर्मचारी की चिंता करता है—चाहे वे गोताखोर हों, सफाई मित्र हों या फायर ब्रिगेड कर्मी। हम समय-समय पर सुविधाएं उपलब्ध करवाते हैं। जो भी नियम और प्रक्रिया के तहत संभव होगा, वह जरूर किया जाएगा।”

गोताखोरों की मांग है कि उन्हें न केवल उचित मानदेय दिया जाए, बल्कि उनकी सेवा को देखते हुए उन्हें नियमित (Permanent) किया जाए।