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बैंक ऑफ जापान ने मौद्रिक नीति में बदलाव किया

देश की अर्थव्यवस्था को संभालने की पहल में जुटा देश

एजेंसियां

टोक्योः जापान की केंद्रीय बैंक का ब्याज दरों को बढ़ाकर 1 प्रतिशत करने का निर्णय वैश्विक वित्तीय परिदृश्य में एक बड़े बदलाव का संकेत है। पिछले 31 वर्षों से जापान ने अपनी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए शून्य या नकारात्मक ब्याज दरों की नीति अपना रखी थी, लेकिन वर्तमान में उत्पन्न मुद्रास्फीति के दबाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में जापानी मुद्रा येन के निरंतर अवमूल्यन ने नीति निर्माताओं को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। यह कदम जापानी अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जो दशकों की शिथिलता के बाद एक नई दिशा की ओर बढ़ने का प्रयास कर रही है।

जापानी निवेशकों के पास विश्व भर के बाजारों में भारी मात्रा में पूंजी निवेशित है। जब तक जापान में ब्याज दरें अत्यंत कम थीं, तब तक ये निवेशक सस्ती पूंजी लेकर वैश्विक बाजारों (जैसे अमेरिकी बॉन्ड या अन्य देशों के शेयर बाजार) में निवेश करते थे। अब, ब्याज दरें बढ़ने से इन निवेशकों द्वारा अपनी पूंजी को स्वदेश वापस बुलाने की प्रबल संभावना है। इस स्थिति को कैरी ट्रेड अनवाइंडिंग कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है और पूंजी के प्रवाह की दिशा पूरी तरह बदल सकती है।

जापान के सामने अब महंगाई को नियंत्रित करने और मुद्रा को मजबूती देने के बीच एक बेहद नाजुक संतुलन बनाने की चुनौती है। यदि ब्याज दरें बहुत तेजी से बढ़ाई जाती हैं, तो यह आर्थिक विकास को धीमा कर सकती है और उपभोक्ताओं की खर्च करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। इसके विपरीत, यदि कदम ढीले रहते हैं, तो येन की कमजोरी बनी रहेगी।

विश्लेषकों का मानना है कि जापान का यह प्रयोग एक महत्वपूर्ण बेंचमार्क बनेगा। दुनिया के कई विकसित देश, जो वर्तमान में कम विकास दर और बढ़ती कीमतों (स्टैगफ्लेशन) जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, वे इस नीति के परिणामों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। यदि जापान सफलतापूर्वक अपनी अर्थव्यवस्था को सामान्य मौद्रिक नीति की ओर ले जाने में सफल होता है, तो यह वैश्विक वित्तीय प्रणाली के लिए एक सफल मॉडल सिद्ध होगा।

यह निर्णय न केवल जापान की आंतरिक आर्थिक स्थिति को सुधारने का प्रयास है, बल्कि यह पूरी दुनिया की वित्तीय स्थिरता के लिए एक नए युग की शुरुआत भी हो सकता है। आने वाले महीनों में इस नीति का असर न केवल एशिया, बल्कि पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देगा।