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Budha Pahar Census 2026: माओवादियों के गढ़ से लोकतंत्र की मुख्यधारा तक; बूढ़ा पहाड़ में पहली बार होगी जनगणना

पलामू: कभी माओवादियों का ट्रेनिंग सेंटर कहा जाने वाला बूढ़ा पहाड़ अब पूरी तरह से बदल चुका है। 2011 की जनगणना के दौरान जो क्षेत्र ‘नो-गो ज़ोन’ माना जाता था, वहां अब 2026 में पहली बार जनगणना टीम बिना किसी डर के दाखिल होगी। यह ऐतिहासिक बदलाव सरकार द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन ऑक्टोपस’ और विकास परियोजनाओं के बाद संभव हो पाया है। अब बूढ़ा पहाड़ के हर परिवार तक पहुंचना और उनका डेटा इकट्ठा करना सरकार की प्राथमिकता है।

🛡️ सुरक्षा के लिए पुलिस का खास ‘प्लान’

बूढ़ा पहाड़ के साथ-साथ पलामू, गढ़वा और लातेहार के उन तमाम गांवों में जनगणना कार्य शुरू हो गया है, जहां पहले टीमें नहीं पहुंच पाती थीं। इन कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलिस ने एक विशेष रणनीति तैयार की है। डीआईजी किशोर कौशल ने स्पष्ट किया है कि पूरे इलाके में अतिरिक्त पुलिस पिकेट और सुरक्षा बल के कैंप तैनात हैं। जनगणना कर्मियों को स्थानीय थानों और कैंपों की सीधी निगरानी में रखा जाएगा ताकि वे निर्भय होकर अपना काम कर सकें।

🗳️ चुनाव के बाद अब जनगणना की बारी

बूढ़ा पहाड़ की बदली तस्वीर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में यहां पहली बार हेसातु जैसे क्षेत्रों में मतदान केंद्र बनाए गए थे। अब जनगणना टीम झालू डेरा, बहेरा टोली, कुल्हि और तिसिया जैसे उन गांवों में भी जाएगी, जहां तीन दशक तक केवल नक्सलियों का साया था। 2023 में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा इसे नक्सल-मुक्त घोषित किए जाने और ‘बूढ़ा पहाड़ डेवलपमेंट प्रोजेक्ट’ शुरू किए जाने के बाद से यह इलाका अब विकास की राह पर है।

📊 27 गांवों और 25 हजार आबादी का डेटा

बूढ़ा पहाड़ इलाके में कुल 27 गांव आते हैं, जिनमें गढ़वा के 16 और लातेहार के 11 गांव शामिल हैं। इस पूरे इलाके की आबादी लगभग 20 से 25 हजार के बीच है। तीन दशकों के लंबे इंतजार के बाद अब पहली बार जनगणना कर्मी इन गांवों के हर परिवार तक पहुंचेंगे और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने का मार्ग प्रशस्त होगा। यह बूढ़ा पहाड़ के निवासियों के लिए लोकतंत्र का एक नया अध्याय है।