मोदी की नई अपील पर नेता प्रतिपक्ष का नया तंज
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उन्होंने मार्च में ही आगाह किया था
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उपदेश नहीं, विफलता का प्रमाण
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कभी जिम्मेदारी से काम भी करें
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: भारतीय अर्थव्यवस्था के वर्तमान संकट और डॉलर के मुकाबले रुपये की ऐतिहासिक गिरावट के बीच, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है। यह हमला तब हुआ जब प्रधानमंत्री ने रविवार को हैदराबाद की एक रैली में देश के नागरिकों से आर्थिक बलिदान देने, सोने की खरीद टालने और ईंधन की खपत कम करने का आह्वान किया। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री की इस अपील को विफलता का कबूलनामा करार दिया है।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक विस्तृत पोस्ट साझा करते हुए लिखा कि प्रधानमंत्री का नागरिकों से बलिदान मांगना वास्तव में सरकार की प्रशासनिक अक्षमता को दर्शाता है। उन्होंने कहा, कल मोदी जी ने जनता से अजीबोगरीब फरमाइशें कीं—सोना मत खरीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, खाद और तेल में कटौती करो।
ये कोई नीतिगत निर्देश नहीं, बल्कि उस विफलता के सबूत हैं जिसे सरकार अब छिपा नहीं पा रही है। गांधी ने आगे तर्क दिया कि 12 वर्षों के शासन के बाद देश को इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया गया है जहाँ सरकार अब जनता की व्यक्तिगत पसंद और उपभोग को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है ताकि वह अपनी जवाबदेही से बच सके। उन्होंने प्रधानमंत्री को समझौतावादी बताते हुए कहा कि देश चलाना अब उनके वश की बात नहीं रही।
राहुल गांधी ने इस दौरान अपनी पुरानी चेतावनियों की याद भी दिलाई। गौरतलब है कि 12 मार्च (2026) को एक संवाददाता सम्मेलन में राहुल गांधी ने देश को आर्थिक मंदी और विदेशी मुद्रा भंडार में आने वाली भारी कमी के प्रति आगाह किया था। उस समय उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि सरकार की अस्थिर आर्थिक नीतियां और विदेशी कूटनीति में चूक भारत को एक ऐसे संकट में धकेल देगी जहाँ आम आदमी का जीना मुहाल हो जाएगा। आज जब रुपया 95 के पार चला गया है, राहुल गांधी ने दावा किया कि उनकी वह चेतावनी आज हकीकत बनकर सामने खड़ी है।
यह राजनीतिक घमासान तब शुरू हुआ जब प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों का हवाला दिया। प्रधानमंत्री ने कहा था कि इन वैश्विक परिस्थितियों के कारण भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव है, इसलिए देशहित में नागरिकों को कुछ समय के लिए अपनी सुख-सुविधाओं और खर्चों में कटौती करनी चाहिए। हालांकि, विपक्ष इसे सरकार की अपनी आर्थिक दूरदर्शिता की कमी के रूप में देख रहा है।