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Bhopal Metro Crisis: भोपाल मेट्रो की रफ्तार पर ‘घाटे’ का ब्रेक! रोजाना 8 लाख खर्च और कमाई सिर्फ ₹20,000; खाली दौड़ रही ट्रेनें

Bhopal News: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में तीन महीने पहले मेट्रो की शुरुआत की गई. मेट्रो की शुरुआत के साथ ही यात्रियों के सफर को और भी सुगम और आरामदायक बनाने की कोशिश की गई. हालांकि भोपाल मेट्रो में कमाई की रफ्तार काफी धीमी है. रोजाना ही मेट्रो को चलाने में आठ लाख रुपए खर्च हो रहा. वहीं दूसरी तरफ कमाई सिर्फ 15 से 20 हजार रोजाना हो रही. ऐसे में मेट्रो के राउंड काफी कम कर दिए गए हैं. तीन महीने में यह तीसरी बार होगा, जब मेट्रो के राउंड घटते-घटते महज 9 तक आ पहुंचे हैं. आखिर क्या वजह है कि भोपाल में मेट्रो पूरी तरह से सफल साबित नहीं हो पा रही है?

आमतौर पर अधिकतर लोगों ने दिल्ली मेट्रो का सफर किया है. मेट्रो को दिल्ली की लाइफ लाइन माना जाता है. मेट्रो यात्रियों का सपना होता है कि मेट्रो उन्हें खाली मिले. उन्हें जल्द से जल्द सीट मिले और भीड़ के बिना ही वह अपना सफर मेट्रो में बेहद आसानी से कर सकें, लेकिन दिल्ली में यह कम ही देखने को मिलता है. हालांकि भोपाल में यह सफर आप रोजाना ही करीब-करीब अकेले कर सकते हैं. बुधवार को टीवी9 डिजिटल की टीम सुभाष नगर मेट्रो स्टेशन पर पहुंची, जहां सन्नाटा पसरा दिखाई दिया. मेट्रो में यात्रा करने वाले यात्री महज दो से तीन थे.

सबसे पहले भोपाल मेट्रो प्रोजेक्ट के बारे में जान लीजिए…

  • भोपाल मेट्रो- वर्तमान स्थिति (अप्रैल 2026).
  • भोपाल मेट्रो (भोज मेट्रो) का कॉमर्शियल ऑपरेशन 21 दिसंबर 2025 से शुरू हो चुका है.
  • फिलहाल यह अपने प्रायोरिटी कॉरिडोर पर चल रही है, लेकिन यात्रियों की कमी और भारी घाटे के कारण इसकी रफ्तार अभी धीमी है.

प्रोजेक्ट का विवरण (ट्रैक और लागत)

  • कुल लागत: पूरे फेज-1 (Phase-1) की अनुमानित लागत लगभग ₹7,500 करोड़ से ₹8,000 करोड़ के बीच है.
  • वर्तमान ट्रैक (Operational): अभी केवल 7.4 किलोमीटर का हिस्सा (सुभाष नगर से AIIMS तक) चालू है.
  • कुल प्रस्तावित ट्रैक: फेज-1 में दो लाइनें हैं, जिनकी कुल लंबाई लगभग 28 किलोमीटर (27.87 किमी) होगी. इसमें ‘ऑरेंज लाइन’ (करोंद चौराहा से AIIMS) और ‘ब्लू लाइन’ (भदभदा चौराहा से रत्नागिरी तिराहा) शामिल है.

अगला चरण: अप्रैल 2026 से शहर के घने इलाकों में भूमिगत खुदाई का काम शुरू होने जा रहा है, जिसके लिए करीब ₹769 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट दिया गया है.

  • रोजाना खर्च (Loss): मेट्रो को चलाने और रख-रखाव का खर्च रोजाना लगभग ₹8 लाख आ रहा है.
  • रोजाना कमाई (Earnings): टिकटों की बिक्री से होने वाली औसत कमाई महज ₹15,000 से ₹20,000 के बीच सिमट गई है.
  • यात्रियों की संख्या: शुरुआत में करीब 1,300 यात्री रोजाना सफर कर रहे थे, जो हाल के महीनों में घटकर 350-500 के आसपास रह गए हैं

यह तो थी इस पूरे प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी. अब आपको वह कारण भी बताते हैं कि आखिरकार मेट्रो भोपाल में पूरी तरह से सफल क्यों नहीं हो पा रही है, क्यों भोपाल की यात्री मेट्रो से सफर करना पसंद नहीं कर रहे हैं.

दिक्कतें क्या हैं?

  • सीमित कनेक्टिविटी: अभी ट्रैक बहुत छोटा (सिर्फ 7 किमी) है, जिससे यह ऑफिस जाने वालों या छात्रों के लिए ज्यादा उपयोगी नहीं है.
  • लंबा इंतजार: दो ट्रेनों के बीच का गैप (Frequency) करीब 1 घंटा या उससे ज्यादा है, जिसकी वजह से लोग बस या निजी वाहनों को चुन रहे हैं.
  • बदला हुआ समय: यात्रियों की कमी के कारण मेट्रो अब सुबह 9 बजे के बजाय दोपहर 12 बजे शुरू होती है और शाम 7:30 बजे बंद हो जाती है.

सुभाष नगर मेट्रो स्टेशन पर सिर्फ 3-4 यात्री ही मिले

सुभाष नगर मेट्रो स्टेशन से कमलापति स्टेशन तक यात्रा के लिए टिकट 30 रुपए का मिला, लेकिन भोपाल के सुभाष नगर मेट्रो स्टेशन पर सन्नाटा ही पसरा हुआ नजर आया. दूर-दूर तक कोई यात्री दिखाई नहीं दे रहा था. मुश्किल से चार यात्री ही मिले. यह भी वह यात्री थे, जो सिर्फ मेट्रो घूमने आए थे. यह अपने परिवार के साथ मेट्रो को देखने और उसमें सफर करने के लिए पहुंचे थे. उन्होंने कहा कि समय काफी ज्यादा लग रहा है. ज्यादा दूर तक मेट्रो चलती नहीं हैय. दो या चार किलोमीटर का सफर हम बाइक या कार से आसानी से कर सकते हैं.

क्या बोले मंत्री विश्वास सारंग?

मेट्रो को लेकर जब टीवी9 डिजिटल की टीम ने मंत्री विश्वास सारंग से बातचीत की तो उन्होंने कहा कि भोपाल का मेट्रो प्रोजेक्ट सरकार के लिए बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है. भोपाल में मेट्रो चलाने का एक सपना था, जो सरकार हुआ है. यह बात सही है कि शुरुआत में कुछ दिक्कतें हैं. अभी मेट्रो का ट्रैक भी छोटा है और मेट्रो का जाल पूरे भोपाल में बिछाया जा रहा है. जगह-जगह वाहनों की वर्षों की कनेक्टिविटी मेट्रो स्टेशन से जोड़ने का प्लान भी है. इसके बाद यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से सफल साबित होगा. आम लोगों के लिए मेट्रो एक लाइफ लाइन के तौर पर साबित होगी. फिलहाल हमारी सरकार पूरी तरह से प्रयासरत है.