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ट्रंप vs ओबामा: क्या ईरान को दी गई 14 हजार करोड़ की रकम ‘फिरौती’ थी? जानें उस विवादित कैश ट्रांसफर की पूरी कहानी

ईरान से जारी जंग के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आज गुरुवार को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन के दौरान पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ हुई ईरान की न्यूक्लियर डील और 1.7 अरब डॉलर की कैश भुगतान का खासतौर से जिक्र किया. भारतीय रुपये के हिसाब से यह रकम करीब 14 हजार करोड़ रुपए बैठती है.

ट्रंप ने इस डील को बकवास करार दिया और ईरान को दी गई 1.7 अरब डॉलर की भुगतान राशि को ईरान को खरीदने की कोशिश बताया. हालांकि इस डील को ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में ही रद्द कर चुके हैं. ट्रंप ने कहा, “मैंने बराक हुसैन ओबामा के ईरान न्यूक्लियर डील को खत्म कर दिया. यह एक डिजास्टर था. ओबामा ने उन्हें 1.7 बिलियन डॉलर कैश दिया. “ग्रीन कैश” वर्जीनिया, डीसी और मैरीलैंड के बैंकों से पैसा निकालकर हवाई जहाजों से भेजा गया, ताकि ईरान का सम्मान और उसकी वफादारी खरीदी जा सके. लेकिन ईरान ने यह काम नहीं किया. उलटे ईरान ने हमारा मजाक उड़ाया और अपना न्यूक्लियर बम बनाने का मिशन जारी रखा.”

JCPOA डील क्या थी क्यों दिए पैसे

आज हम आपको बताते हैं कि JCPOA डील क्या थी और ओबामा प्रशासन की ओर से ईरान को 1.7 अरब डॉलर कैश हवाईजहाज में क्यों भरकर भेजे गए थे? इस डील का पूरा नाम है Joint Comprehensive Plan of Action 2015 यानी JCPOA 2015. यह डील ओबामा प्रशासन के समय अमेरिका, ईरान और P5+1 देशों (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी) के बीच हुई थी.

डील का मकसद युद्ध के बगैर ही ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना था. बदले में ईरान से यह कहा गया कि उसे अपना यूरेनियम संवर्धन सीमित करना होगा, पुरानी मशीनें हटानी होगी, न्यूक्लियर साइट्स पर अंतरराष्ट्रीय जांच की अनुमति देना होगा और 15 साल तक सख्त नियम भी मानना होगा.

डील के बाद में ईरान पर से कड़े आर्थिक प्रतिबंध (सैंक्शंस) हटाए गए, तेल निर्यात और वैश्विक व्यापार की छूट मिली और विदेश में फंसा पैसा वापस मिलने लगा.

इस पर ट्रंप का कहना है कि यह डील बहुत ही कमजोर थी. क्योंकि इसमें समयसीमा तय की गई थी (15 साल बाद नियम खत्म हो जाते), इसके अलावा बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम शामिल नहीं किया गया था और ईरान को जो मिला पैसा वह उसका इस्तेमाल प्रॉक्सी ग्रुप्स (जैसे हिजबुल्लाह) को सपोर्ट करने में कर सकता था. इसलिए 2018 में उन्होंने अमेरिका को इस डील से बाहर निकाल लिया और फिर से नए प्रतिबंध लगा दिए.

1.7 डॉलर बिलियन कैश का क्या मामला?

ट्रंप अक्सर इस पैसे का जिक्र करते हैं. साल 2016 में ओबामा प्रशासन ने ईरान को करीब 1.7 अरब डॉलर दिए थे? तो इसमें सच्चाई क्या है? यह कोई नई “मदद” या “रिश्वत” नहीं थी. बल्कि यह 1979 की ईरानी क्रांति से पहले का पुराना बकाया था. तब ईरान ने अमेरिका से मिलिट्री उपकरण खरीदने के लिए एडवांस पेमेंट किया था. लेकिन क्रांति के बाद यह डील रद्द हो गई, हथियार नहीं दिए गए और पैसा फंस गया.

समझौते के तहत कुल राशि 400 मिलियन डॉलर मूल राशि और इसमें 1.3 बिलियन डॉलर ब्याज जुड़ गया. उस समय ईरान पर बैंकिंग प्रतिबंध थे, इसलिए बैंक में पैसा ट्रांसफर नहीं हो सका. पैसा विदेशी मुद्रा (यूरो या स्विस फ्रैंक) में पैलेट्स (ढेर) भरकर हवाई जहाजों से भेजा गया. यहीं से “प्लेन फूल ऑफ कैश” वाली चर्चा शुरू हुई.

अब इस पर फिर विवाद क्यों?

डोनाल्ड ट्रंप और उनके समर्थक इसे “रैंसम” यानी फिरौती बताते हैं क्योंकि यह सब कुछ ईरान के कुछ बंधकों की रिहाई के समय हुआ था. ओबामा प्रशासन का कहना था कि यह कानूनी सेटलमेंट था. अगर कोर्ट केस हारते तो ज्यादा पैसा देना पड़ सकता था. दोनों डील्स को अलग-अलग बताया गया. हालांकि पैसा पुराना बकाया था, लेकिन जिस तरीके से कैश भेजा गया, उससे विवाद बढ़ गया.

ईरान में 1979 में हुई ईरानी क्रांति विवाद की मुख्य वजह बनी. ईरान क्रांति आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में मानी जाती है. इस क्रांति ने न सिर्फ देश की सत्ता बदली, बल्कि अमेरिका के साथ रिश्तों को भी पूरी तरह पलट कर दुश्मनी में बदल दिया.

क्रांति से पहले क्या थे ईरान में हालात?

साल 1979 से पहले ईरान पर शाह मोहम्मद रजा शाह पहलवी का शासन हुआ करता था. वह अमेरिका के करीबी माने जाते थे. जिमी कार्टर समेत अमेरिकी नेतृत्व के साथ उनके मजबूत संबंध थे. ईरान अमेरिका से हथियार और सैन्य उपकरण खरीद रहा था. इसी दौरान ईरान ने अमेरिका को बड़ी रकम एडवांस में दी थी, जो बाद में विवाद का कारण बनी.

शाह के शासन के खिलाफ लोगों में नाराजगी बढ़ने लगी. इसकी मुख्य वजहें थीं, तानाशाही और विरोधियों पर सख्ती, अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई, पश्चिमी असर और पारंपरिक मूल्यों में कमी शामिल थीं. कई लोगों को लगता था कि सरकार जनता के बजाय अमेरिका के हितों के लिए काम कर रही है.

कैसे हुई क्रांति?

1978-79 में देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू होने लगे और जल्द ही बड़े आंदोलन में बदल गया. इस आंदोलन का नेतृत्व धार्मिक नेता रुहोल्लाह खुमैनी ने किया. शाह को देश छोड़कर भागना पड़ा. खुमैनी सत्ता में आए और ईरान अब इस्लामिक रिपब्लिक बन गया. इस तरह से राजशाही सत्ता खत्म हो गई और धार्मिक नेतृत्व शुरू हुआ.

अमेरिका-ईरान रिश्ते क्यों बिगड़े?

क्रांति के बाद सबसे बड़ा घटनाक्रम था ईरान बंधक संकट. तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया गया. 52 अमेरिकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया. इसके बाद दोनों देशों के रिश्ते पूरी तरह टूट गए और प्रतिबंधों का दौर शुरू हो गया.

अरबों डॉलर का विवाद कैसे शुरू हुआ?

क्रांति से पहले ईरान ने अमेरिका को हथियार खरीदने के लिए एडवांस भुगतान किया था. लेकिन क्रांति के बाद डील रद्द हो गई. अमेरिका ने न तो हथियार दिए और न ही तुरंत पैसा लौटाया. यह पैसा दशकों तक फंसा रहा और बाद में 2016 में बराक ओबामा के समय इसे लौटाया गया.

ईरानी क्रांति सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं थी, बल्कि एक ऐसा मोड़ था जिसने देश ईरान की राजनीतिक व्यवस्था बदल दी. अमेरिका के साथ रिश्ते खराब कर दिए. आज तक जारी तनाव की नींव रख दी. यही वजह है कि आज भी ईरान और अमेरिका के बीच टकराव की जड़ें 1979 की इसी क्रांति से जुड़ी हुई हैं.