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AIIMS Delhi Alumna Nepal Health Minister: एम्स दिल्ली की पूर्व छात्रा डॉ. निशा मेहता बनीं नेपाल की स्वास्थ्य मंत्री, जानें उनके सामने क्या हैं बड़ी चुनौतियां

निशा मेहता को नेपाल में स्वास्थ्य मंत्री नियुक्त किया गया है. निशा भले ही नेपाल की स्वास्थ्य मंत्री हैं, लेकिन उनका भारत से गहरा नाता है. निशा, पीएम बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) से सांसद थीं. वो शुरुआत से ही स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में सक्रिय रहीं. इन्होंने नर्सिंग पेशे के बाद राजनीतिक में कदम रखा. वो इस पार्टी के शुरुआती दिनों से ही एक आम सदस्य के तौर पर इससे जुड़ी रही थीं.

2022 के आम चुनावों के दौरान भी RSP ने उन्हें अपनी आनुपातिक प्रतिनिधित्व सूची में भी शामिल किया था. उस समय के चुनाव के दौरान निशा को नेपाली संसद में कोई सीट नहीं मिल पाई थी. लेकिन इस बार वो राजनीतिक नेताओं की नई पीढ़ी के हिस्से के तौर पर संघीय संसद में पहुंचीं. ऐसे में उन्हें प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार में स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है.

भारत से क्या है रिश्ता?

दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) से जुड़े हुए नर्सिंग महाविद्यालय से पढ़ाई की है. नर्सिंग में मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद, निशा मेहता नेपाल लौट आईं. बिराटनगर के बिराट टीचिंग हॉस्पिटल में काम किया. उन्होंने कोशी में ‘नेपाल पुलिस वाइव्स एसोसिएशन’ की प्रशासनिक सचिव के तौर पर भी काम किया है. यहां उन्होंने स्वास्थ्य शिविरों, महिलाओं और बच्चों के कल्याण से जुड़े कार्यक्रमों के आयोजन में अहम भूमिका निभाई. मेहता ने 2006 से 2010 तक इस संस्थान से मास्टर की पढ़ाई की थी. उन्होंने 27 मार्च को नेपाल के स्वास्थ्य मंत्री पद की शपथ ली.

हेल्थ सिस्टम की ये है चुनौती

नेपाल के प्रमुख स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम ने नागरिकों को किफायती और बेहतर स्वास्थ्य सेवा देने के लिए डिजाइन किया गया है. एक गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहा है. यहां के पूर्व स्वास्थ्य सचिव टंका बराकोटी के मुताबिक, निशा मेहता की बीमा योजना में सुधार करना सबसे ऊपर होना चाहिए. बराकोटी ने कहा कि इस कार्यक्रम में बड़े पैमाने पर पुनर्गठन की जरूरत है.

नेपाल सरकार ने चालू वित्त वर्ष में इस कार्यक्रम के लिए 10 अरब रुपये आवंटित किए थे. पिछले साल के बकाया भुगतानों को निपटाने के लिए ही लगभग 11 अरब रुपये की जरूरत थी. स्वास्थ्य बीमा बोर्ड के मुताबिक, सरकार ने 1 अरब रुपये का अतिरिक्त अनुदान दिया था. लेकिन पूरी राशि पुराने बकायों को चुकाने में ही खर्च हो गई. प्रीमियम संग्रह केवल लगभग 3.5 अरब रुपये तक ही पहुंच पाया है, जबकि कार्यक्रम का खर्च लगभग हर महीने 2 अरब रुपये और सालाना 24 अरब रुपये है. अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि कोई स्थायी वित्तपोषण सोर्स नहीं मिला, तो यह कार्यक्रम शायद जारी न रह पाए.