ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के फैसले से पेंटागन विशेषज्ञ भी हैरान
वाशिंगटनः वाशिंगटन पोस्ट की एक हालिया रिपोर्ट ने पेंटागन और रक्षा विशेषज्ञों के बीच नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के साथ चल रहे युद्ध के मात्र चार सप्ताह के भीतर अमेरिकी सेना ने 850 से अधिक टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का उपयोग किया है। इतनी कम अवधि में इतनी बड़ी संख्या में सटीक मार करने वाले हथियारों का इस्तेमाल करना युद्ध की तीव्रता और अमेरिकी रणनीति की आक्रामक प्रकृति को दर्शाता है।
पेंटागन (जिसे अब युद्ध विभाग के रूप में पुनर्गठित किया जा रहा है) के भीतर कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने मिसाइलों के इस बर्निंग रेट (खत्म होने की दर) पर चिंता व्यक्त की है। टॉमहॉक मिसाइलें अपनी लंबी दूरी और अचूक सटीकता के लिए जानी जाती हैं, लेकिन इनका निर्माण समय लेने वाला और खर्चीला होता है। 850 मिसाइलों का अर्थ है कि अमेरिका ने अपने उपलब्ध स्टॉक का एक बड़ा हिस्सा एक महीने में ही उपयोग कर लिया है। आंतरिक चर्चाओं में अब इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है, तो इन हथियारों की उपलब्धता और उत्पादन क्षमता को कैसे बढ़ाया जाए।
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने इन चिंताओं को कमतर बताते हुए कहा कि अमेरिका के पास राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा शुरू किए गए ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के सभी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिकी शस्त्रागार किसी भी वैश्विक चुनौती से निपटने में सक्षम है। लेविट ने यह भी संकेत दिया कि राष्ट्रपति ट्रंप रक्षा ठेकेदारों पर दबाव डाल रहे हैं कि वे मेड इन अमेरिका हथियारों का उत्पादन और तेज करें। यह राष्ट्रपति की उस नीति का हिस्सा है जिसमें वह अमेरिकी सेना को दुनिया की सबसे आधुनिक और अजेय शक्ति बनाए रखना चाहते हैं।
पेंटागन, जिसका नाम बदलकर अब युद्ध विभाग करने की प्रक्रिया चल रही है, ने अपनी तैयारियों पर पूर्ण भरोसा जताया है। विभाग के मुख्य प्रवक्ता सीन पार्नेल ने एक कड़ा संदेश देते हुए कहा कि सेना के पास किसी भी मिशन को किसी भी समय और स्थान पर अंजाम देने की पूरी क्षमता है।
यह बयान उन दावों को खारिज करने के लिए दिया गया है जिनमें अमेरिकी सैन्य भंडार में कमी की बात कही जा रही थी। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में मिसाइलों का उपयोग ईरान के हवाई सुरक्षा तंत्र और रणनीतिक ठिकानों को पूरी तरह नष्ट करने की योजना का हिस्सा है। हालांकि, भविष्य की चुनौती इन महंगे हथियारों के उत्पादन और भंडार को संतुलित बनाए रखने की होगी, ताकि देश की समग्र रक्षा तैयारी प्रभावित न हो।