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नासा का डार्ट मिशन का असली मकसद सफल

भविष्य में आने वाले खतरों से निपटने का रास्ता दिखा

  • क्षुद्रग्रह पर इसे आजमाया गया था

  • टक्कर के पास पूरी धुरी ही बदल गयी

  • भविष्य में भी इसी तकनीक का उपयोग हो पायेगा

राष्ट्रीय खबर

रांचीः नासा के डार्ट (डबल एस्टेरॉयड रीडायरेक्शन टेस्ट) मिशन ने न केवल एक छोटे क्षुद्रग्रह (एस्टेरॉयड) की गति को बदला, बल्कि हालिया शोध से पता चला है कि सितंबर 2022 में डिमोर्फोस नामक क्षुद्रग्रह से अंतरिक्ष यान की जानबूझकर की गई टक्कर ने सूर्य के चारों ओर पूरे क्षुद्रग्रह प्रणाली के पथ को भी थोड़ा बदल दिया है। यह खोज इस बात का पुख्ता सबूत प्रदान करती है कि भविष्य में किसी खतरनाक क्षुद्रग्रह को पृथ्वी की ओर आने से रोकने के लिए टक्कर देने वाला पिंड तकनीक का उपयोग किया जा सकता है।

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डिमोर्फोस और उसका बड़ा साथी डिडिमोस गुरुत्वाकर्षण द्वारा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, जिसे वैज्ञानिक एक बाइनरी सिस्टम (द्वि-तारा प्रणाली) कहते हैं। जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, टक्कर के बाद वैज्ञानिकों ने इस जोड़ी की गति का सूक्ष्मता से विश्लेषण किया। उनके मापन से पता चला कि सूर्य के चारों ओर इस प्रणाली की 770 दिनों की कक्षा (ऑर्बिट) में एक सेकंड के कुछ अंश का बदलाव आया है। यह पहली बार है जब मानव निर्मित यान ने सौर मंडल के किसी प्राकृतिक पिंड की कक्षा को मापने योग्य स्तर तक बदला है।

नासा के वैज्ञानिक थॉमस स्टैटलर के अनुसार, हालांकि यह बदलाव बहुत मामूली है, लेकिन लंबे समय में यही छोटा सा बदलाव एक महत्वपूर्ण विचलन बन सकता है। डार्ट मिशन ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि सही समय पर किसी एक सदस्य को टक्कर दी जाए, तो पूरी क्षुद्रग्रह प्रणाली का मार्ग बदला जा सकता है।

जब डार्ट यान डिमोर्फोस से टकराया, तो अंतरिक्ष में चट्टानी मलबे का एक विशाल गुबार निकला। वैज्ञानिकों ने पाया कि इस मलबे ने मोमेंटम एन्हांसमेंट फैक्टर के रूप में कार्य किया, जिससे टक्कर का प्रभाव लगभग दोगुना हो गया। यानी केवल यान की टक्कर से जितनी ताकत मिलती, मलबे के बाहर निकलने से वह बल दोगुना हो गया। पहले के शोधों ने बताया था कि इस टक्कर ने डिडिमोस के चारों ओर डिमोर्फोस की कक्षा को 33 मिनट कम कर दिया था, लेकिन नया शोध पुष्टि करता है कि अब सूर्य के चारों ओर का पूरा पथ ही बदल गया है।

भविष्य की सुरक्षा के लिए नासा अब एनईओ सर्वेयर मिशन विकसित कर रहा है। यह पहला अंतरिक्ष टेलीस्कोप होगा जो विशेष रूप से पृथ्वी के पास के उन काले क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं की खोज करेगा जिन्हें पहचानना कठिन होता है। इसके अलावा, दुनिया भर के स्वयंसेवी खगोलविदों द्वारा दर्ज की गई स्टेलर अकल्टेसन्स (नक्षत्र प्रच्छादन) की घटनाओं ने वैज्ञानिकों को इस बदलाव की गणना करने में महत्वपूर्ण मदद की। अंततः, इस मिशन ने मानवता को यह आत्मविश्वास दिया है कि हम अंतरिक्ष से आने वाले संभावित खतरों से अपनी पृथ्वी की रक्षा करने में सक्षम हैं।

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