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सीमेंट निविदा में कंपनियों की आपसी मिलीभगत

ओएनजीसी की शिकायत के बाद व्यापारी गठजोड़ का खुलासा

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः जब भारत के सबसे बड़े तेल खोजकर्ता, ओएनजीसी ने 2018 में सीमेंट ऑर्डर के लिए निविदा खोली, तो उसे कुछ संदिग्ध लगा। सभी प्रतिस्पर्धी बोलियां ठीक 7,000 रुपये प्रति मीट्रिक टन थीं। जब इंडिया सीमेंट्स के एक कार्यकारी से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजा अपनाते हुए कहा कि सात उनका लकी नंबर है।

समीक्षा की गई भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की एक गोपनीय रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी ओएनजीसी को निशाना बनाकर पिछले एक दशक से अधिक समय से कीमतों में मिलीभगत चल रही थी। पांच साल की लंबी जांच के बाद पता चला कि डालमिया सीमेंट (भारत) और श्री दिग्विजय सीमेंट के बीच 2007 से 2018 तक 12 वर्षों का कार्टेल काल रहा। इंडिया सीमेंट्स भी 2017-18 में इस गुटबंदी का हिस्सा बनी।

रिपोर्ट में भारतीय कंपनियों द्वारा मिलीभगत के स्पष्ट प्रयासों की पहचान की गई है। सीसीआई ने श्री दिग्विजय के पूर्व एमडी राजीव नांबियार, डालमिया भारत के अरबपति चेयरमैन वाई.एच. डालमिया और इंडिया सीमेंट्स के एन. श्रीनिवासन सहित आठ शीर्ष अधिकारियों को इन उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार ठहराया है। श्री दिग्विजय के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रेम आर. सिंह की गवाही के अनुसार, समान मूल्य उद्धृत करने का मुख्य उद्देश्य कंपनियों के बीच राजस्व और वॉल्यूम का बराबर बंटवारा करना था।

जांच में यह भी सामने आया कि इन कंपनियों ने निविदा भरने वाली विदेशी कंपनियों, जैसे टेक्सास स्थित श्लम्बरगर और यूएई की क्लासिक ऑयल फील्ड केमिकल्स को भी निशाना बनाया। उन्होंने सरकार से विदेशी बोलीदाताओं के पास आवश्यक प्रमाणन न होने की शिकायतें कीं और स्वदेशी को बढ़ावा देने का तर्क दिया।

जांचकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि इन कंपनियों ने कम से कम एक बार सीमेंट की आपूर्ति को प्रतिबंधित करने का निर्णय लेकर ओएनजीसी पर विदेशी बोलियों को रद्द करने का दबाव बनाने की कोशिश की, जो अविश्वास कानूनों का उल्लंघन है। एक कार्यकारी ने दूसरे को लिखा था कि वे इस बात को हजम नहीं कर पा रहे थे कि कोई विदेशी बोलीदाता निविदा जीत जाए।