छह साल से लटका था मामले का फैसला
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा फैसला सुरक्षित रखने के छह साल बाद भी निर्णय न सुनाए जाने की घटना ने भारतीय न्यायपालिका में न्याय में देरी के गंभीर मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस असाधारण परिस्थिति में हस्तक्षेप करते हुए संविधान के अनुच्छेद 139ए के तहत इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित तीन आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित कर लिया है।
यह मामला मूल रूप से 30 मई 1994 को हुई एक हत्या से जुड़ा है। इस मामले में नौ आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धाराओं 147, 148, 149, 302 और 307 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। कानूनी दांवपेच तब शुरू हुए जब 2008 में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक आरोपी, छोटे सिंह के खिलाफ आरोप वापस लेने का प्रस्ताव रखा। बाद में, 2012 में सरकार ने सभी आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने के लिए आवेदन किया। निचली अदालत ने छोटे सिंह के खिलाफ मुकदमा वापस लेने की अनुमति दी, लेकिन अन्य के खिलाफ इसे खारिज कर दिया। इसी आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाएं 2012 से हाई कोर्ट में लंबित थीं।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि हाई कोर्ट ने 5 फरवरी 2020 को फैसला सुरक्षित रख लिया था, लेकिन छह साल बीत जाने के बाद भी कोई निर्णय नहीं सुनाया। इस दौरान मामला बार-बार सूचीबद्ध हुआ और स्थगित होता रहा। यहाँ तक कि 4 फरवरी 2026 को भी मामला फिर से स्थगित कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अत्यधिक देरी याचिकाकर्ता के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत त्वरित न्याय के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
सामान्यतः अनुच्छेद 32 के तहत ऐसी याचिकाओं पर विचार नहीं किया जाता, लेकिन जब न्यायिक निष्क्रियता के कारण निचली अदालत की कार्यवाही (ट्रायल) पूरी तरह ठप हो जाए, तो हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। कोर्ट ने कहा कि गंभीर अपराधों में इतनी लंबी देरी न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता को खत्म कर देती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के महापंजीयक को निर्देश दिया है कि वह तीन सप्ताह के भीतर मामले के सभी रिकॉर्ड शीर्ष अदालत को भेजें। अब भारत के मुख्य न्यायाधीश के आदेश के बाद इन याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट स्वयं सुनवाई करेगा और फैसला सुनाएगा।