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पंद्रह लोगों को देश छोड़ने का अल्टीमेटम

विदेशियों के मुद्दे पर हिमंता बिस्वा सरमा का कठोर फैसला

  • फिलहाल डिटेंसन सेंटर में रखे गये हैं लोग

  • कानून के तहत उन्हें नोटिस जारी की गयी

  • भाजपा विधायक की नागरिकता पर याचिका

भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटीः असम में नागरिकता और विदेशियों के निष्कासन के मुद्दे ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। राज्य सरकार की सख्त कार्रवाई और एक मौजूदा विधायक की नागरिकता पर कानूनी सवाल, इन दो घटनाओं ने प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। असम सरकार ने नागांव जिले के 15 व्यक्तियों को, जिन्हें फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा ‘विदेशी’ घोषित किया जा चुका है, 24 घंटे के भीतर भारत छोड़ने का कड़ा आदेश दिया है। ये सभी व्यक्ति नागांव के विभिन्न हिस्सों के निवासी हैं और 1990 से 2021 के बीच इन्हें विदेशी घोषित किया गया था। वर्तमान में ये सभी गोलपारा के मतिया डिटेंशन सेंटर में बंद हैं।

यह आदेश इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) एक्ट, 1950 के तहत जारी किया गया है। नागांव के जिला उपायुक्त द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि इन व्यक्तियों की मौजूदगी सार्वजनिक हित और आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा है। इन्हें धुबरी और श्रीभूमि जैसे चिन्हित रास्तों के जरिए भारत की सीमा से बाहर जाने का निर्देश दिया गया है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के अनुसार, 1950 के इस पुराने कानून और हाल ही में तैयार की गई एसओपी के माध्यम से सरकार लंबी कूटनीतिक प्रक्रियाओं को दरकिनार कर निष्कासन प्रक्रिया को तेज करना चाहती है।

दूसरी ओर, गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने रताबारी निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा विधायक बिजोय मालाकार की नागरिकता की स्थिति पर असम और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। एक रिट याचिका में दावा किया गया है कि मालाकार और उनके माता-पिता 25 मार्च, 1971 की निर्धारित कट-ऑफ तारीख के बाद बांग्लादेश से असम आए थे, जो उन्हें भारतीय नागरिकता और सार्वजनिक पद धारण करने के लिए अयोग्य बनाता है। याचिकाकर्ताओं, ब्रज गोपाल सिन्हा और बिजोय कुमार कानू का आरोप है कि मालाकार का नाम पहली बार 2005 की मतदाता सूची में बिना किसी आधार के दिखाई दिया।

1966 और 1971 की महत्वपूर्ण मतदाता सूचियों में उनके पिता का कोई रिकॉर्ड नहीं है। उनकी मां का नाम किसी भी सूची में उपलब्ध नहीं है। अदालत में दायर याचिका के अनुसार, यह संविधान के अनुच्छेद 191(1) और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जिला प्रशासन की पिछली वेरिफिकेशन रिपोर्ट भी अधूरी है क्योंकि वह 1971 से पहले का कोई पुख्ता लिंक स्थापित नहीं कर पाई है। अब इस मामले में चुनाव आयोग, सीमा पुलिस और विधानसभा अध्यक्ष को भी प्रतिवादी बनाया गया है।