रीवा: शहर से लगभग 40 किलोमीटर दूर बसा क्योटी जलप्रपात आज विंध्य का सबसे पसंदीदा पर्यटन केंद्र बनकर उभर रहा है. यह स्थान केवल सुंदर प्राकृतिक झरने के लिए ही नहीं, बल्कि अपने ऐतिहासिक महत्व, आध्यात्मिक आभा और घने जंगलों के रोमांचकारी माहौल के लिए भी जाना जाता है. रीवा राजघराने की धरोहर से लेकर पौराणिक महत्व तक, क्योटी हर पहलू में समृद्ध है.
प्रकृति, रोमांच और इतिहास का ऐसा संगम पर्यटकों को कहीं और आसानी से नहीं मिलता. इसी कारण क्योटी जलप्रपात आज ‘विंध्य का मिनी वेकेशन स्पॉट’ बन चुका है, जिसे स्थानीय लोगों के साथ-साथ UP और बिहार से आने वाले सैलानी भी बेहद पसंद कर रहे हैं.
क्योटी वाटरफॉल देखने का रोमांच
क्योटी जलप्रपात और ऐतिहासिक किला इन दिनों विंध्य क्षेत्र के सबसे चर्चित पर्यटन स्थलों में शुमार हो चुके हैं. वीकेंड पर यहां न सिर्फ रीवा, सतना और सीधी से बल्कि प्रयागराज, वाराणसी, अयोध्या और लखनऊ जैसे बड़े शहरों से भी पर्यटकों की भीड़ उमड़ रही है. प्राकृतिक सौंदर्य, राजघराने के इतिहास से जुड़ा किला, पौराणिक महत्व और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे रील्स सब मिलकर क्योटी को ऐसा डेस्टिनेशन बना रहे हैं जहां पहुंचने से सैलानी खुद को रोक ही नहीं पाते हैं.
विंध्य का मिनी हिल डेस्टिनेशन
विंध्य की पहाड़ियों के बीच बसा क्योटी अब उत्तर भारत के यात्रियों के लिए सबसे आसान और सबसे नजदीकी पहाड़ी एक्सपीरियंस बन गया है. रीवा से सिर्फ 40 किमी, प्रयागराज से 80 किमी, बनारस से 150 किमी और लखनऊ-अयोध्या से सीधे सड़क मार्ग जरिए लोग पहुंचते हैं. यह दूरी क्योटी को वीकेंड टूरिज्म के लिए एक परफेक्ट गेटवे बनाती है.
क्योटी में रोमांच, सुकून और सोशल मीडिया का क्रेज
यहां पहुंचते ही सैलानियों का सामना होता है शिवधाम के साथ ही सुन्दर पहाड़ों के बीच से गिरते झरने, खामोश घाटियां, और घने जंगलों की ठंडी हवा से, जो किसी मिनी हिल स्टेशन जैसा अनुभव देती है. सोशल मीडिया पर वायरल ड्रोन व्यूज़, रील्स और ट्रैवल ब्लॉग्स ने क्योटी को यूथ के बीच अचानक से ‘विंध्य का सबसे ट्रेंडिंग नेचर स्पॉट’ बना दिया है. अब क्योटी सिर्फ एक झरना नहीं, बल्कि विंध्य का नया नेचर-हिल डेस्टिनेशन बनकर उभर रहा है जहां रोमांच भी है, सुकून भी, और सोशल मीडिया की चमक भी है.
दो जल प्रपातों का संगम और महाना नदी की अक्षय धारा
क्योटी दुर्ग के बारे मे एक अद्भुत किंवदंती है. स्थानीय लोग बताते हैं “यहां पर दो जलप्रपात हैं, लेकिन प्रकृति ने दोनों को एक जैसा महत्व नहीं दिया. एक जलप्रपात सदियों से सूखा पड़ा है, जबकि दूसरे में महाना नदी की मुख्यधारा पूरे बारहों महीने निर्झर की तरह बहती रहती है.” कहा जाता है कि घने जंगलों से निकलकर आने वाली इस नदी ने कभी रात के सन्नाटे में दोनों जलप्रपातों के बीच अदृश्य संवाद सुना था.
जब होने लगी दो जलप्रपातों के बीच बहस
किंवदंती के अनुसार, उस रात दोनों जलप्रपातों में इस बात पर बहस हुई कि नदी किसे अपना मार्ग बनाएगी, आखिरकार, वही जलप्रपात नदी की पसंद बन गया, जिसमें उसकी आत्मिक लगन अधिक थी. यही कारण है कि रातों रात महाना नदी का स्वरूप बदल गया और उसकी अक्षय धारा हमेशा के लिए उसी जलप्रपात में समाहित हो गई. क्योटी का यह रहस्य आज भी यात्रियों को मोह लेता है. क्योंकि यहां केवल पानी नहीं गिरता, बल्कि सदियों पुरानी कहानी भी निरंतर बहती रहती है.
क्योटी किला की पहाड़ियों का राज
स्थानीय निवासी आशीष तिवारी निर्मल के मुताबिक “क्योटी की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित प्राचीन दुर्ग कभी रीवा रियासत की रणनीति और सुरक्षा का मुख्य आधार हुआ करता था. लगभग 1500 ईस्वी में बघेल राजवंश के शासकों ने इस किले का निर्माण कराया था, जहां सैनिकों की तैनाती से लेकर गोपनीय बैठकों तक राज्य की अहम योजनाएं तैयार होती थी. आज भले ही किला खंडहर में बदल गया हो, लेकिन इसके अवशेष अब भी उस समय की वास्तुकला और सामरिक समझ का जीवंत प्रमाण बनकर खड़े हैं.”
ऐतिहासिक किला और वाटर फॉल का बेजोड़ संगम
आशीष तिवारी निर्मल बताते हैं “किले में उस दौर में गोपनीय सुरंगें, खजाने की सुरक्षा हेतु विशेष कक्ष, और दुश्मनों पर नजर रखने के लिए कई सुरक्षा संरचनाएं बनाई गई थी. इनमें से कई निशान आज भी स्पष्ट दिखाई देते हैं. क्योटी किले की सबसे रोचक बात यह है कि इसकी एक छिपी हुई सुरंग सीधे जलप्रपात की गहराई तक जाती है. यह एक ऐसा गुप्त रास्ता है जिसका उपयोग कभी सियासत की सुरक्षा और आपात स्थितियों के लिए किया जाता था.”
किंवदंतियां और पौराणिक मान्यताएं
क्योटी को विंध्य पर्वत की आध्यात्मिक ऊर्जा से भरी पवित्र धरती माना जाता है. जलप्रपात के प्रवेश द्वार से कुछ ही दूर ऊंचाई पर स्थित प्रसिद्ध भैरव बाबा मंदिर मौजूद है, जो यहां की आस्था का केंद्र है. मान्यता है कि भैरव बाबा क्योटी आने वाले श्रद्धालुओं और सैलानियों की रक्षा करते हैं. मकर संक्रांति के अवसर पर बड़ी संख्या में स्थानीय लोग मंदिर परिसर में एकत्रित होकर भजन कीर्तन करते हैं.
इस दौरान सामूहिक भंडारे का आयोजन भी होता है. छुट्टी के दिनों में यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में लगभग दोगुनी हो जाती है. प्राकृतिक सौंदर्य, शांत वातावरण और सुरक्षित लोकेशन के कारण क्योटी आज फैमिली और युवाओं, दोनों की पसंदीदा पिकनिक डेस्टिनेशन बनती जा रही है.
फिल्मी दुनिया में भी छाए विंध्य के पर्यटन स्थल
क्योटी जलप्रपात और ऐतिहासिक किला अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के कारण फिल्मों और म्यूजिक वीडियो के लिए एक आदर्श लोकेशन बन चुका है. यहां पहली बार फिल्म ‘बिंदिया और बंदूक’ की शूटिंग हुई थी, जिसमें मुख्य भूमिका में किरण कुमार नजर आए थे. सोशल मीडिया की लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही बघेली कलाकारों के साथ-साथ भोजपुरी फिल्म और वीडियो निर्माता भी इस लोकेशन की ओर आकर्षित हुए.
फिल्मों की सूटिंग के लिए गजब का स्पॉट
अब तक क्योटी में 40 से अधिक शॉर्ट फिल्म और म्यूजिक वीडियो की शूटिंग सफलतापूर्वक की जा चुकी है. स्थानीय कलाकारों के अनुसार, क्योटी का वाटरफॉल, घने घाटियां, ऐतिहासिक किला और सुरम्य वादियां प्रोडक्शन के लिए बिल्कुल नेचुरल फिल्मी बैकग्राउंड प्रदान करती हैं, UP की तुलना में यहां का लैंडस्केप बिल्कुल अलग है.
घाटियां, पत्थर की चट्टानें और जंगल पर्यटकों को अलग अनुभव देते हैं. रील्स, यूट्यूब व्लॉग्स और ड्रोन शॉट्स से क्योटी ट्रेंडिंग डेस्टिनेशन में है. UP के युवा और कपल्स के लिए यह ‘फोटो-फ्रेंडली’ लोकेशन भी मानी जाती हैं.
राजा नागमलदेव ने कराया था ऐतिहासिक किले का निर्माण
इतिहासकार डॉ. चंद्र प्रकाश मिश्रा के मुताबिक “क्योटी दुर्ग-रीवा के लालगांव मार्ग पर स्थित हैं. यह दुर्ग महानदी के पूर्वी तट पर विस्तृत भू-भाग में फैला हुआ है. क्योटी में स्थिति एहतियासिक किले का निर्माण रीवा राज्य में स्थित बघेल राजवंश के 17वें महाराजा शालिवाहन के द्वितीय पुत्र राजा नागमलदेव के द्वारा 15वीं शताब्दी में करवाया गया था. महाराजा शालिवाहन के मृत्यु के पश्चात उनकी जेष्ट पुत्र महाराजा वीरसिंहदेव बांधवगढ़ के राजा हुए और छोटे भाई नागमलदेव को क्योटी का इलाका सौंपा गया.”
प्राकृतिक सौंदर्य को बांहों में समेटे क्योटी जल प्रपात
इतिहासकार बताते हैं कि “एतिहासिक क्योटी किला के पिछले भू-भाग से सटा विशाल गहरे महानदी का जलकुण्ड हैं. इसी जलकुण्ड की 331 फीट उंची खड़ी चट्टानों की प्राकृतिक दीवार से सटकर खड़े किले की संरचना को देखकर ऐसा प्रतीत होता हैं कि कुंड के तट पर किले का निर्माण करना सुरक्षा व्यवस्था ही प्रमुख कारण था. शायद यही वजह है कि एहतियासिक किले के साथ ही प्राकृतिक सौन्दर्य को अपने बांहों मे समेटे हुए हैं. क्योटी जलप्रपात पर्यटकों को अपनी और आकर्षित करता है.”
बताया जाता है कि क्योटी का यह ऐतिहासिक किला 1857 में रीवा के क्रांतिकारियों द्वारा अंग्रेजों से किए विद्रोह की गवाही देता है. 1857 में रीवा के ठाकुर रणमत सिंह और अंग्रेज कर्नल आसर्वन का इसी किले में भीषण युद्ध हुआ था जिसमें क्रांतिकारियों ने अंग्रेज सैनिकों को जमकर धूल चटाई थी और इस युद्ध में कई अंग्रेजो की मौत भी हुई थी. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के साक्षी होने के कारण इस किले का महत्त्व और भी बढ़ जाता हैं.