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ब्रिटिश प्रधानमंत्री स्टारमर पर विश्वासघात का आरोप लगा

श्रमिकों के अधिकारों पर यू-टर्न को लेकर विवाद

लंदनः ब्रिटेन की लेबर पार्टी के नेता कीर स्टारमर को अपने ही दल के सांसदों के एक समूह से तीव्र आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। यह आलोचना श्रमिकों के अधिकारों को लेकर पार्टी की नीति में कथित यू-टर्न के बाद सामने आई है। कई वामपंथी और यूनियन से जुड़े लेबर सांसदों ने इस बदलाव को पूर्ण विश्वासघात करार दिया है, जिससे पार्टी के भीतर गहरा विभाजन पैदा हो गया है।

यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब लेबर पार्टी ने अपने पहले के वादे से पीछे हटते हुए, यह संकेत दिया कि यदि वे सत्ता में आते हैं, तो वे शून्य-घंटे के अनुबंधों को पूरी तरह से समाप्त करने या रोजगार सुरक्षा को तुरंत मजबूत करने के अपने कुछ वादों को कमजोर कर सकते हैं। पार्टी नेतृत्व का तर्क है कि वे व्यवसायों के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाए बिना सुधारों को लागू करने के लिए अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपना रहे हैं। उनका मानना है कि अचानक और बड़े बदलावों से नौकरी सृजन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

हालांकि, पार्टी के भीतर के आलोचक इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि स्टारमर का नेतृत्व लेबर पार्टी के मूल मूल्यों को छोड़ रहा है, जो श्रमिकों और ट्रेड यूनियनों के अधिकारों की रक्षा पर आधारित हैं। एक वरिष्ठ लेबर सांसद ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि यह बदलाव पूंजी के हितों के आगे झुकना है और उन लाखों श्रमिकों के साथ धोखा है जिन्होंने लेबर पार्टी में अपना विश्वास जताया था। उनका मानना है कि यह नीतिगत बदलाव मतदाताओं को यह संदेश देगा कि पार्टी अपने चुनावी वादों पर भरोसा करने लायक नहीं है।

यूनियन नेताओं ने भी अपनी गहरी निराशा व्यक्त की है। उनका तर्क है कि शून्य-घंटे के अनुबंध, जो कर्मचारियों को न्यूनतम सुरक्षा प्रदान करते हैं, आधुनिक श्रम बाजार की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक हैं और इन्हें समाप्त करने का वादा लेबर पार्टी के घोषणापत्र का एक आधारभूत स्तंभ था। यह आंतरिक संघर्ष कीर स्टारमर के नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि उन्हें आम चुनावों से पहले पार्टी के विभिन्न गुटों को एकजुट करने की आवश्यकता है। यह घटना दर्शाती है कि सत्ता की दहलीज पर खड़ी लेबर पार्टी को अपनी विचारधारा और चुनावी जीत की व्यावहारिकता के बीच जटिल संतुलन स्थापित करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। इस खींचतान का सीधा असर ब्रिटेन के भविष्य के श्रम कानूनों पर पड़ सकता है।