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दिल के अरमां आंसुओं में .. .. .. ..

क्या क्या सोच रखा था। बड़े बड़े वादे कर दिये थे। अब ईवीएम से जिन्न निकला तो सर चकरा गया। असली बात तो यह है कि सिर्फ महागठबंधन ही नहीं बल्कि मोदी भक्त मीडिया वालों को भी यह खेल समझ में नहीं आया। अब विद्वान लोग इसके बाल की खाल निकालते रहेंगे कि जब तेजस्वी के नेतृत्व वाली पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ा तो सीटें क्यों नहीं मिली। बेचारे राहुल गांधी तो पहले ही यह कहकर पल्ला झाड़ चुके हैं कि यह चुनाव शुरु से ही निष्पक्ष नहीं था। अब गहन विश्लेषण से इसके अंदर के तथ्य बाद में बाहर निकलेंगे।

बिहार के चुनाव परिणाम सामने आए तो पता चला कि जनता ने बदलने से ज़्यादा बने रहने पर भरोसा जताया है। एनडीए ने जिस प्रचंड बहुमत के साथ जीत हासिल की है, उससे लगता है कि बिहार की जनता ने तय कर लिया था कि भैया, जोखिम नहीं लेना!

नीतीश कुमार की शख्सियत राजनीति के अमरबेल हैं। 20 साल की एंटी-इनकम्बेंसी को धता बताते हुए, 80 से अधिक सीटें जीतना बताता है कि उन्होंने साबित कर दिया कि बिहार में सत्ता की चाबी किसी की भी हो सकती है, लेकिन ताला हमेशा मेरे पास ही रहेगा। हर चुनाव में लोग इनके जादू को समझने की कोशिश करते हैं, लेकिन हर बार ये एक नए अवतार में आकर बाज़ी मार लेते हैं। यह जीत इस बात का प्रमाण है कि विकास कम हो या ज़्यादा, लेकिन अनुभवी चाचा पर भरोसा कायम है।

युवा तेजस्वी यादव ने पूरी ताकत लगाई, जंगल राज के आरोपों को रोजगार के वादों से काटने की कोशिश की, पर अंत में जंगल राज के डर की पुरानी कैसेट, मोदी की गारंटी के नए डीजे साउंड के सामने टिक न पाई। ऐसा लगता है कि बिहार की जनता ने कहा, रोजगार तो ठीक है बेटा, पर पहले सुरक्षा और स्थिरता! बेचारे राहुल गांधी, जिनकी पार्टी कांग्रेस महज़ 6 सीटों पर सिमट गई, वे तो इस परिणाम को निष्पक्ष नहीं बताकर अपने दुख भरे अरमान को बहा रहे हैं। कांग्रेस ने महागठबंधन के लिए अंकल पॉल का काम किया है—सिर्फ़ रिश्तेदारी निभाई, वोट नहीं दिलाए।

यह चुनाव परिणाम सिद्ध करता है कि बिहार में राजनीति अब एक बहु-स्तरीय जुआ है, जिसमें स्थानीय चाचा और राष्ट्रीय दादा का मिश्रण ही चलता है। जनता ने बड़े बदलाव की बजाय ज्ञात स्थिरता को चुना है। यह परिणाम विपक्ष के लिए एक कड़वा संदेश है: अगर आप जंगल राज के डर को नहीं मिटा सकते, तो कम से कम चाचा से कम सीटें जीतने का डर तो मिटा ही सकते हैं!

इसी बात पर एक हिट फिल्म का गीत याद आ रहा है। यह गीत 1982 की फ़िल्म निकाह से है। इस गीत को लिखा था हसम कमाल ने और संगीत में ढाला था रवि ने। इसे सलमा आगा, जो इस फिल्म की हीरोइन थी, ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल इस तरह हैं

दिल के अरमां आँसुओं में बह गए

दिल के अरमां आँसुओं में बह गए

हम वफ़ा कर के भी तन्हा रह गए

हम वफ़ा कर के भी तन्हा रह गए

ज़िन्दगी एक प्यास बन कर रह गई

ज़िन्दगी एक प्यास बन कर रह गई

प्यार के क़िस्से अधूरे रह गए

प्यार के क़िस्से अधूरे रह गए

हम वफ़ा कर के भी तन्हा रह गए

दिल के अरमां आँसुओं में बह गए

शायद उनका आख़िरी हो ये सितम

शायद उनका आख़िरी हो ये सितम

हर सितम ये सोच कर हम सह गए

हर सितम ये सोच कर हम सह गए

हम वफ़ा कर के भी तन्हा रह गए

दिल के अरमां आँसुओं में बह गए

ऐसी बरबादी पे क्या अफ़सोस क्या

ऐसी बरबादी पे क्या अफ़सोस क्या

प्यार की दुनिया लुटा कर रह गए

प्यार की दुनिया लुटा कर रह गए

हम वफ़ा कर के भी तन्हा रह गए

दिल के अरमां आँसुओं में बह गए

हम वफ़ा कर के भी तन्हा रह गए

हम वफ़ा कर के भी तन्हा रह गए

अब इससे आगे की सोच यह है कि बिहार का सीएम कौन होगा। अगर भाजपा ने अपना सीएम बनाने की चाल चली तो जदयू पर इसका क्या असर होगा। वैसे समझदार लोग मानते हैं कि जब तक भागलपुर के सृजन घोटाले की जांच सीबीआई में हैं, नीतीश कुमार ज्यादा छलांग लगाने की कोशिश नहीं करेंगे।

खैर झारखंड में हुए उपचुनाव में सोमेश सोरेन की जीत के बाद मंत्रिमंडल में उनकी एक सीट पक्की है। तो क्या मंत्रिमंडल के फेरबदल में कुछ नये चेहरे शामिल होंगे और राजद के एक मात्र मंत्री सत्यानंद भोक्ता को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। लाख नहीं करोड़ टके की बात है पर असली उत्तर तो सिर्फ हेमंत सोरेन ही जानते हैं।