ए आई के खतरों से अनभिज्ञ नहीं है देश का शीर्ष अदालत
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जनहित याचिका पर सुनवाई में चर्चा
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जेन ए आई से नई परेशानियां आयी हैं
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न्यायपालिका में इसका उपयोग वर्जित हो
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने सोमवार को न्यायपालिका के खिलाफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और अन्य डिजिटल उपकरणों के बढ़ते दुरुपयोग को स्वीकार किया और बताया कि उन्होंने अपनी मॉर्फ्ड तस्वीरें भी देखी हैं। मुख्य न्यायाधीश ने यह टिप्पणी न्यायिक और अर्ध-न्यायिक निकायों में जनरेटिव एआई के उपयोग को विनियमित करने के लिए दिशानिर्देश या नीति बनाने की मांग करने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान की।
वकील कार्तिकेय रावल द्वारा दायर याचिका में दावा किया गया है कि जेन ए आई नया डेटा और गैर-मौजूद केस कानून बनाकर कानूनी प्रणाली में अस्पष्टता पैदा कर सकता है। याचिका में आगाह किया गया है कि जेन ए आई मौजूदा पूर्वाग्रहों, भेदभाव और रूढ़िवादी प्रथाओं को दोहरा सकता है, जिससे गंभीर नैतिक और कानूनी चुनौतियाँ पैदा हो सकती हैं।
याचिका में कहा गया है कि जेन ए आई का एक ब्लैक बॉक्स जैसा अपारदर्शी स्वरूप भारत की कानूनी प्रणाली में अस्पष्टता पैदा कर सकता है। इस विधा से उत्पन्न मतिभ्रम की क्षमता से फर्जी केस कानून और एआई पूर्वाग्रह पैदा हो सकते हैं। इसका मतलब है कि जेन ए आई की जानकारी नज़ीरों पर आधारित न होकर अस्तित्वहीन कानून पर आधारित हो सकती है, जिसे अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन माना गया है।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि न्यायपालिका में एकीकृत एआई में उपयोग किया जाने वाला डेटा पूर्वाग्रह से मुक्त होना चाहिए और डेटा का स्वामित्व पारदर्शी होना चाहिए ताकि हितधारकों की जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन भी शामिल थे, ने मामले को दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया है।