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न्यायिक प्रक्रिया की विसंगति से उमर खालिद जेल में

भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में एक बड़ी विसंगति है। विचाराधीन कैदियों की बढ़ती संख्या और जेल में उनके लंबे समय तक बिना दोषसिद्धि के बंद रहना। यह समस्या कानूनी प्रक्रिया की सुस्ती और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) जैसे कड़े कानूनों के मनमाने उपयोग के कारण और भी गंभीर हो जाती है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद का मामला इसी व्यवस्था का एक ज्वलंत उदाहरण है, जो न्याय में देरी और जेल में रहने के बढ़ते दंड पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सितंबर 2020 में गिरफ्तार किए गए उमर खालिद पर फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित साज़िश रचने का आरोप है।

यह मामला यूएपीए के तहत दर्ज किया गया है, जिसकी सख्त जमानत शर्तें, अभियुक्त के लिए राहत पाना लगभग असंभव बना देती हैं। चार साल से अधिक समय से खालिद जेल में हैं, जबकि उन पर लगे आरोप अभी सिद्ध नहीं हुए हैं। उनकी जमानत याचिकाएं कई बार खारिज हो चुकी हैं, भले ही उनके वकील ने सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी है कि उनके खिलाफ हिंसा या दंगों से जुड़ा कोई ठोस भौतिक साक्ष्य नहीं है, और उनके भाषणों में केवल गांधीवादी सिद्धांतों की बात की गई थी।

खालिद की निरंतर हिरासत, भारतीय न्याय प्रणाली में एक मूलभूत सिद्धांत पर प्रश्नचिह्न लगाती है: जब तक दोष सिद्ध न हो जाए, तब तक निर्दोष। यूएपीए जैसे कानूनों में, जमानत से इंकार करना एक तरह से प्रक्रिया ही दंड बन जाता है, जहां अभियुक्त को बिना दोषसिद्धि के ही एक लंबी सज़ा काटनी पड़ जाती है।

अदालत में मामले की सुनवाई में लगने वाला वर्षों का समय, अभियुक्त के जीवन, करियर और आज़ादी को अपूरणीय क्षति पहुंचाता है। विचाराधीन कैदियों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार और न्याय में देरी का एक और दुखद और विस्तृत उदाहरण फादर स्टेन स्वामी का है। भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद मामले में 83 वर्षीय मानवाधिकार कार्यकर्ता और झारखंड के आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले फादर स्टेन स्वामी को अक्टूबर 2020 में गिरफ्तार किया गया था।

उन पर प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के साथ संबंध होने और हिंसा भड़काने का आरोप था, जिसके तहत उन पर भी यूएपीए की धाराएं लगाई गई थीं। गिरफ्तारी के समय, फादर स्टेन स्वामी पार्किंसंस रोग और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित थे। जेल में उनकी हालत बिगड़ने के बावजूद, मानवीय आधार पर भी उन्हें जमानत देने से बार-बार इनकार किया गया।

उन्होंने एक बार सिपर (पानी पीने के लिए स्ट्रॉ वाला मग) तक की मांग की थी, जिसमें भी अत्यधिक देरी हुई। अंततः, गंभीर रूप से बीमार होने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां जुलाई 2021 में हिरासत के दौरान ही उनका निधन हो गया। फादर स्टेन स्वामी की मृत्यु ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर न्याय प्रणाली की अमानवीयता पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की।

उनकी क़ैद और मौत ने दिखाया कि कैसे कठोर कानून, न्याय की प्रक्रिया को बाधित कर सकते हैं और कैसे न्यायिक प्रक्रिया में देरी एक बुजुर्ग और बीमार व्यक्ति के लिए मृत्युदंड के समान बन सकती है। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि विचाराधीन कैदियों की मानवीय स्थिति और स्वास्थ्य को नजरअंदाज करना कितना खतरनाक हो सकता है।

भारत की जेलों में बंद 75 फीसद से अधिक कैदी विचाराधीन हैं, जिन्हें अभी दोषी ठहराया जाना बाकी है। यह आंकड़ा न्यायपालिका की धीमी गति और जमानत प्रणाली की विफलता को दर्शाता है। यूएपीए में जमानत मिलना बेहद कठिन है, क्योंकि अदालत को प्रथम दृष्टया यह मानना पड़ता है कि आरोप सत्य हैं। यह प्रावधान लंबे समय तक मनमानी हिरासत का आधार बन जाता है।

अदालतों में जजों की कमी, मामलों का अत्यधिक बोझ, और जटिल जांच प्रक्रियाओं के कारण मुकदमों में वर्षों लग जाते हैं। जब तक मुकदमा खत्म होता है, तब तक कैदी पहले ही एक लंबी सज़ा काट चुका होता है। पुलिस को जांच पूरी करने में लंबा समय लगता है, और कई बार सालों बाद भी पूरक आरोपपत्र दाखिल किए जाते हैं, जिससे सुनवाई और लंबी खिंचती है।

गरीब और हाशिए के कैदी अक्सर पर्याप्त कानूनी सहायता से वंचित रह जाते हैं, जिससे उनकी जमानत की अर्जी कमजोर पड़ जाती है। विचाराधीन कैदियों को वर्षों तक जेल में रखना न केवल उनके मानवाधिकारों (अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है, बल्कि यह आपराधिक न्याय प्रणाली की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। उमर खालिद और फादर स्टेन स्वामी के मामले इस बात पर जोर देते हैं कि एक आधुनिक और लोकतांत्रिक समाज में, न्याय की प्रक्रिया को ही सज़ा नहीं बनने दिया जा सकता।