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गुप्त सूचना के मामले में फेल हो गयी सरकार

उप राज्यपाल की सरकार सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ा रही

  • गुज्जर बकरवालों से दूरी बढ़ गयी है

  • जमीनी निगरानी का काम लगभग बंद

  • घने जंगलों में प्रशिक्षित आतंकवादी

राष्ट्रीय खबर

श्रीनगरः जम्मू-कश्मीर के घने जंगलों में सुरक्षा बलों और गुज्जर-बकरवाल समुदायों के बीच बढ़ता अविश्वास आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। पाकिस्तानी आतंकवादियों ने इसका फायदा उठाकर पीर पंजाल और चिनाब घाटी के जंगलों को अपना सुरक्षित ठिकाना बना लिया है। एक समय में, ये खानाबदोश चरवाहे, जो अपनी भेड़ों और बकरियों के साथ घूमते थे, सुरक्षा बलों के लिए जमीनी खुफिया जानकारी का एक महत्वपूर्ण स्रोत थे। वे संदिग्ध गतिविधियों और छिपे हुए ठिकानों का पता लगाने में मदद करते थे, लेकिन अब यह प्राकृतिक निगरानी लगभग खत्म हो गई है।

यह खुफिया शून्यता कई कारणों से पैदा हुई है। सबसे बड़ा कारण है समुदाय और सुरक्षा बलों के बीच का बढ़ता अलगाव। 2018 में कठुआ की घटना, 2020 में अमशीपुरा की फर्जी मुठभेड़, और 2023 में पुंछ में तीन नागरिकों की हिरासत में मौत जैसी घटनाओं ने इस अविश्वास को गहरा कर दिया है। इन घटनाओं से गुज्जर और बकरवाल समुदायों में आक्रोश और उपेक्षा की भावना बढ़ी है। समुदाय के नेताओं का मानना है कि इन समुदायों के अधिकारों, विशेषकर वन भूमि पर उनके दावों को भी अनदेखा किया गया है, जिससे उनकी नाराजगी और बढ़ी है।

सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि आतंकवादी रणनीति में भी बदलाव आया है। अब ये घुसपैठिए अनुभवहीन स्थानीय युवक नहीं, बल्कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के युद्ध-प्रशिक्षित लड़ाके हैं। ये गुरिल्ला युद्ध और जंगल में जीवित रहने के विशेषज्ञ हैं, जो हफ्तों तक गुफाओं और जंगलों में छिप सकते हैं। इस नई पीढ़ी के आतंकवादी गांवों के कार्यकर्ताओं पर कम और जंगलों के निर्जन इलाकों की आड़ पर ज़्यादा भरोसा कर रहे हैं, जिससे उन्हें ढूंढना और खत्म करना और भी मुश्किल हो गया है।

सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा के अनुसार, गुज्जर-बकरवाल समुदायों ने पहले भी आतंकवाद विरोधी अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जैसे कि 2003 के ऑपरेशन सर्प विनाश में। वे न केवल सेना की आँख और कान थे, बल्कि रक्षा की पहली पंक्ति भी थे। हुड्डा जोर देकर कहते हैं कि हमें उन्हें अप्रासंगिक मानने के बजाय उनके साथ संबंधों को फिर से स्थापित करना होगा।

अधिकारियों और विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए सिर्फ सैन्य रणनीति काफी नहीं है, बल्कि विश्वास का पुनर्निर्माण भी उतना ही जरूरी है। पाकिस्तानी घुसपैठिए हर कमजोर कड़ी का फायदा उठा रहे हैं – चाहे वह भौगोलिक हो, परिचालन संबंधी हो या सामाजिक। जब तक गुज्जर-बकरवाल समुदाय को वापस जोड़ा नहीं जाता, तब तक इन जंगलों में आतंकवादियों की पैठ और मजबूत होती रहेगी। यह चुनौती अब सिर्फ जमीनी सैनिकों की नहीं, बल्कि उन समुदायों के साथ विश्वास का मजबूत बंधन फिर से बनाने की है जो कभी जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा की सबसे मजबूत दीवार हुआ करते थे।