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उत्तर भारत में प्राकृतिक आपदा या आमंत्रित संकट

पिछले कुछ हफ्तों से, उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत के बड़े हिस्से बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में हैं। इस आपदा ने इन क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई है, जिससे जान-माल का भारी नुकसान हुआ है। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली जैसे राज्यों में स्थिति गंभीर बनी हुई है।

पंजाब में इस समय बड़े पैमाने पर बाढ़ आई हुई है, जिसने सैकड़ों गाँवों और कस्बों को अपनी चपेट में ले लिया है। इस विनाशकारी आपदा में कम से कम 30 लोगों की जान जा चुकी है और सैकड़ों करोड़ रुपये की संपत्ति का नुकसान हुआ है। लोगों के घर तबाह हो गए हैं, फसलें बह गई हैं, और सड़कें व पुल बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए हैं।

राज्य की प्रमुख नदियाँ, जैसे रावी और ब्यास, उफान पर हैं और कई बांधों में पानी खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है। हालांकि, मानसून की शुरुआत में हुई अच्छी बारिश को धान की फसल के लिए फायदेमंद माना जा रहा था, लेकिन अब इस बाढ़ ने हजारों एकड़ की खड़ी फसलों को बर्बाद कर दिया है। इससे किसानों की मेहनत पर पानी फिर गया है और उनकी आर्थिक स्थिति पर गहरा संकट आ गया है।

बचाव और राहत कार्य लगातार जारी हैं, लेकिन नुकसान इतना बड़ा है कि उससे उबरने में लंबा समय लगेगा। पंजाब की तरह ही, हरियाणा भी इस आपदा से प्रभावित हुआ है, हालांकि यहाँ नुकसान कम है। कई गाँवों, सड़कों और अन्य बुनियादी ढाँचों को क्षति पहुँची है। वहीं, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ हफ्तों से भूस्खलन, बादल फटने और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला जारी है।

इन क्षेत्रों में, जो पर्यटन और कृषि पर निर्भर हैं, अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। दिल्ली में भी यमुना नदी का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है, जिससे राष्ट्रीय राजधानी पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। इन राज्यों में बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर विस्थापित करना पड़ा है। इस संकट की घड़ी में भी, हमेशा की तरह, राजनीति बीच में आ गई है।

प्रभावित राज्यों, जहाँ विपक्षी दलों का शासन है, और केंद्र सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप का खेल चल रहा है। पंजाब जैसे राज्यों ने राहत, पुनर्निर्माण और पुनर्वास के लिए केंद्र से आर्थिक सहायता पैकेज की मांग की है। यह समय राजनीतिक हितों को परे रखकर प्रभावित लोगों की मदद को प्राथमिकता देने का है, ताकि वे अपने जीवन को फिर से पटरी पर ला सकें।

इन आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि अब हमें केवल आपदा के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय एक निवारक दृष्टिकोण अपनाने की सख्त ज़रूरत है। दशकों से हमारी योजनाएँ प्राकृतिक विशेषताओं और क्षेत्रीय ज़रूरतों के अनुकूल नहीं रही हैं।

उदाहरण के लिए, उत्तराखंड में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए जिस तरह का बुनियादी ढाँचा विकसित किया गया है, वह क्षेत्र की पर्यावरणीय संवेदनशीलता के साथ पूरी तरह से मेल नहीं खाता। ये सभी प्रभावित राज्य हिमालयी और उप-हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के नाजुक हिस्से हैं। हमारे पारंपरिक भूमि-उपयोग और जल-प्रबंधन की योजनाओं ने पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुँचाया है।

वनोन्मूलन, वनों पर अतिक्रमण, नदियों और जल निकायों का विनाश, और पानी के प्राकृतिक प्रवाह को रोकना जैसे कारक ही इन आपदाओं की प्रमुख वजह हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के बारे में व्यापक चर्चाएँ हुई हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इस पर कार्रवाई अभी भी बहुत कम हुई है।

वैज्ञानिकों ने वर्षों से इन आपदाओं के जोखिम के बारे में चेतावनी दी है, लेकिन हमारी सरकारें और योजनाकार इन चेतावनियों को गंभीरता से लेने में विफल रहे हैं। इस समय हमें न केवल पुनर्निर्माण पर ध्यान देना चाहिए, बल्कि भविष्य में ऐसी आपदाओं को रोकने के लिए एक समग्र और टिकाऊ रणनीति भी बनानी चाहिए।

इसमें पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण पर प्रतिबंध, वनीकरण को बढ़ावा देना और नदियों व जल निकायों को पुनर्जीवित करना शामिल होना चाहिए। यह संकट एक कठोर चेतावनी है कि हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलना होगा। अगर हम ऐसा नहीं करते हैं, तो भविष्य में ऐसी और भी गंभीर आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है।

इसके साथ साथ शहरीकरण की तरफ तेजी से दौड़ते भारत में नगर विकास में व्याप्त भ्रष्टाचार को भी समझना होगा। अनेक बड़े महानगरों में जलजमाव और जलभराव की एक मुख्य वजह पानी के निकास के प्राकृतिक रास्तों को बंद करना भी है। इसी तरह पहाड़ों पर भी डैम और निकासी में पैसों की बंदरबांट हुई है। अधिक जल एकत्रित होने की स्थिति में वह नीचे की तरफ आयेगा, यह स्वाभाविक है। अब निजी लाभ के लिए जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी अपना काम कितनी ईमानदारी से कर रहे हैं, उसका भी मूल्यांकन होना चाहिए।