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लंबी बीमारी के बाद सत्यपाल मलिक का निधन

मोदी से सीधे टकराव की वजह से राजनीतिक चर्चा में रहे

  • छात्र नेता के तौर पर समाजवादी बने

  • चौधरी चरण सिंह के बहुत करीबी रहे

  • पुलवामा हमला पर मोदी के विरोधी बने

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः वरिष्ठ राजनेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल, सत्यपाल मलिक का 79 वर्ष की आयु में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया है। उनका निधन मंगलवार को नई दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में हुआ, जहाँ वे इलाजरत थे। सत्यपाल मलिक का कार्यकाल अगस्त 2018 से अक्टूबर 2019 तक जम्मू-कश्मीर के अंतिम राज्यपाल के रूप में काफी महत्वपूर्ण रहा।

उनके कार्यकाल के दौरान ही 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को निरस्त कर जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया गया था। यह एक ऐतिहासिक फैसला था, जिसकी छठी वर्षगांठ आज ही है। आतंकवाद की शुरुआत के बाद जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल बनने वाले वह पहले राजनेता थे।

मलिक का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में हुआ था। उनका राजनीतिक सफर 1960 के दशक के अंत में एक छात्र नेता के रूप में शुरू हुआ, जहाँ उन्होंने समाजवादी विचारधारा को अपनाया। अपने लंबे राजनीतिक करियर में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया और विभिन्न दलों के साथ भी जुड़े रहे।

वह तीन बार सांसद और केंद्र में राज्य मंत्री भी रहे। 1974 में, उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम रखा और बागपत से विधायक चुने गए। इसके बाद उन्होंने चौधरी चरण सिंह के लोकदल में शामिल होकर पार्टी के महासचिव के रूप में कार्य किया। 1980 में, वे लोकदल के टिकट पर राज्यसभा पहुँचे।

1984 में, मलिक कांग्रेस में शामिल हुए और 1986 में फिर से राज्यसभा में लौट आए। हालाँकि, राजीव गांधी के कार्यकाल में बोफोर्स घोटाले के बाद, उन्होंने 1987 में कांग्रेस छोड़ दी और वीपी सिंह के जनता दल में शामिल हो गए। 1989 में, उन्होंने जनता दल के उम्मीदवार के रूप में अलीगढ़ से लोकसभा चुनाव जीता और केंद्रीय संसदीय कार्य एवं पर्यटन राज्य मंत्री बने।

2004 में, उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा का दामन थामा, लेकिन लोकसभा चुनाव हार गए। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में, उन्हें भूमि अधिग्रहण विधेयक की समीक्षा के लिए एक संसदीय पैनल का प्रमुख बनाया गया। उनके पैनल ने इस विधेयक का विरोध किया, जिसके बाद सरकार ने इसे वापस ले लिया।

जम्मू-कश्मीर के बाद, सत्यपाल मलिक को गोवा का राज्यपाल नियुक्त किया गया। इसके बाद, उन्होंने अक्टूबर 2022 तक मेघालय के राज्यपाल के रूप में कार्य किया। इससे पहले, 2017 में, उन्होंने कुछ समय के लिए बिहार के राज्यपाल का पद भी संभाला था।

राज्यपाल का पद छोड़ने के बाद, सत्यपाल मलिक केंद्र सरकार के एक मुखर आलोचक के रूप में सामने आए। उन्होंने किसान आंदोलन का खुलकर समर्थन किया और केंद्र के किसानों के प्रति रवैये की आलोचना की। उन्होंने कहा कि आप किसानों को अपमानित करके वापस नहीं भेज सकते।

2019 के पुलवामा हमले को लेकर उनके द्वारा लगाए गए आरोप सबसे ज्यादा चर्चा में रहे। 2023 में दिए गए एक बयान में उन्होंने दावा किया कि यह हमला एक गंभीर खुफिया विफलता का परिणाम था।

उन्होंने आरोप लगाया कि सीआरपीएफ के जवानों को हवाई जहाज से ले जाने का अनुरोध गृह मंत्रालय ने अस्वीकार कर दिया था। मलिक ने यह भी दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने उन्हें इस मामले पर चुप रहने के लिए कहा था।

सत्यपाल मलिक का निधन भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत है, जिसमें उन्होंने एक समाजवादी नेता से लेकर एक प्रमुख राज्यपाल और सरकार के आलोचक तक की भूमिका निभाई।