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रांची में विधि व्यवस्था और अपराध नियंत्रण में बाधक बॉडीगार्ड

हाईकोर्ट की पहल के बाद भी जिला पुलिस नहीं सुधरी

  • कागज पर तो थाना में तैनात हैं यह लोग

  • हाईकोर्ट के पूर्व जजों से अंगरक्षक लौटाये गये

  • कई लोगों के लिए रौब का साधन है बॉडीगार्ड

राष्ट्रीय खबर

रांचीः रांची में अपराध नियंत्रण और विधि व्यवस्था संधारण में बार बार पुलिस की कमी दिखती है। इसके बाद भी इस समस्या के मूल में जाकर उसका निराकरण करने की दिशा में किसी ने पहल नहीं की है। दरअसल रांची के शहरी क्षेत्रों में स्थापित थानों में पुलिस बल की भारी कमी है।

ऐसा नहीं है कि इन थानों में पुलिस के पद स्वीकृत नहीं हैं पर असली खेल वहां पदस्थापित होने के बाद भी इन पुलिस वालों का अन्यत्र काम करना है। सूत्रों की मानें तो कई ऐसे थाने भी हैं, जहां स्वीकृत और पदस्थ सिपाहियों में से आधे कहीं और काम कर रहे हैं। मामले की जांच में यह पता चला है कि दरअसल अत्यधिक संख्या में लोगों को अंगरक्षक प्रदान किये जाने की वजह से ही थानों में पुलिसबल की कमी हो गयी है।

बताते हैं कि झारखंड उच्च न्यायालय के नये मुख्य न्यायाधीश ने पदभार ग्रहण करने के बाद वहां की स्थिति की समीक्षा की थी। इसके बाद ही वहां काफी पहले सेवानिवृत्त हो चुके न्यायाधीशों के पास तैनात पुलिस की संख्या को उन्होंने कम करने का निर्देश जारी किया था। जिसका पालन भी किया गया। उच्च न्यायालय की इस पहल के बाद भी पुलिस विभाग में इस किस्म की पहल नहीं हुई।

जानकार बताते हैं कि अनेक पैरवी पुत्रों को भी नाहक ही अंगरक्षक प्रदान किया गया है। इन अंगरक्षकों के बेजा इस्तेमाल से भी सामाजिक परेशानियां खड़ी हो रही है। कई लोग ऐसे हैं, जो बिना अंगरक्षक के बाहर जाने से कतराते हैं और उनकी रौब भी साथ के अंगरक्षकों की वजह से कायम होता है। ऐसे लोग सामाजिक कार्यक्रमों में अपने अंगरक्षकों की टोली के साथ पहुंचकर अपना रौब गांठते हैं

वैसे मामले की छानबीन से यह संकेत भी मिले हैं कि रांची के थानों में पदस्थ अनेक हथियारबंद पुलिस वाले रांची के बाहर भी हैं। वरीय अधिकारियों के रांची से बाहर स्थित घरों में वे काम करते हैं और वेतन का भुगतान जनता के पैसे से नियमित हो रहा है। इसी क्रम में सूत्र ने बताया कि सिर्फ पुलिस के हथियारबंद सिपाही ही नहीं बल्कि पुलिस के वाहनों की ऑडिट हो तो वाहनों के भी रांची से बाहर होने की जानकारी मिल जाती है। अन्य शहरों में झारखंड के नंबर प्लेट वाले लाल बत्ती वाले वाहनों को देखने की भी पुष्टि हुई है।

कुल मिलाकर रांची के थानों में स्वीकृत पुलिस सिपाहियों की संख्या से काफी कम पुलिस होने की वजह से पुलिस का मूल काम काज प्रभावित हो रहा है। चूंकि किस थाना का सिपाही किस अफसर या नेता के साथ है, इसकी जानकारी थानेदार को होती है। लिहाजा वे भी अपनी तरफ से अपने सिपाहियों को थाना में डियूटी करने के लिए दबाव नहीं डाल पा रहे हैं।