भारत का धरती का स्वर्ग आतंकवादी गतिविधियों और महामारी की पिछली घटनाओं पर काबू पाने के बाद कुछ हद तक स्थिरता की ओर लौटा है। लेकिन आतंकवाद की हालिया लहर ने घाटी को अतीत के काले दिनों की ओर वापस खींच लिया है।
इस नरसंहार की जिम्मेदारी रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) ने ली है, जिसमें दो विदेशियों सहित कम से कम 26 पर्यटक मारे गए हैं। केंद्रीय खुफिया एजेंसियों का दावा है कि टीआरएफ कोई अलग इकाई नहीं है, बल्कि लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) का एक रणनीतिक पुनर्गठन है।
उल्लेखनीय बात यह है कि हाल के दिनों में इन समूहों के प्रतिनिधित्व के तरीके में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। लश्कर-ए-तैयबा या जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) जैसे कट्टरपंथी धार्मिक संगठनों के स्थान पर द रेजिस्टेंस फ्रंट और पीपुल्स एंटी-फासीस्ट फ्रंट (पीएएफएफ) जैसे नए संगठन उभरे हैं।
ये आतंकवादी पाकिस्तान स्थित जिहादी समूहों की छाया सेना हैं। 2019 में अनुच्छेद 370 को हटाने और जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के मोदी सरकार के फैसले से क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव आया।
परिणामस्वरूप, ये उग्रवादी समूह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अपनी गतिविधियों में भी बदलाव करते हैं। अपना नाम या पहचान बदलकर ये समूह लोगों में भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि क्षेत्रीय स्तर पर उनके लिए समर्थन बरकरार रहे।
उनका एक उद्देश्य नए सदस्यों को गुप्त रखकर बिना किसी संदेह के अपनी आतंकवादी गतिविधियों को जारी रखना है। दरअसल, प्रतिरोध जैसे शब्दों को अपनाकर ये समूह वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं, यहां तक कि अपनी हिंसक गतिविधियों को वैध संघर्ष के रूप में पेश कर रहे हैं।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि टीआरएफ जैसे आतंकवादी समूह अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के कुछ महीनों के भीतर ही उभरे हैं। अपने पूर्ववर्तियों की तरह, टीआरएफ और पीएएफएफ सुरक्षा बलों और नागरिकों पर हमला करना, आतंकवादियों की भर्ती करना और सीमा पार हथियारों और ड्रग्स की तस्करी करना जारी रखते हैं।
दूसरी ओर, समूहों की भर्ती रणनीति भी बदल गई है। जहां पहले मस्जिदों और धार्मिक मदरसों का उपयोग भर्ती के लिए किया जाता था, वहीं अब टीआरएफ और पीएएफएफ ऑनलाइन काम करते हैं। वे क्रोध भड़काने के लिए टेलीग्राम और इंस्टाग्राम जैसे माध्यम से छेड़छाड़
की गई छवियों, भावनात्मक कथाओं और भारतीय सुरक्षा अभियानों के वीडियो का उपयोग करके असंतुष्ट युवाओं को निशाना बनाते हैं। कभी-कभी आर्थिक मंदी और भावनात्मक आघात को भी युवा पीढ़ी को आकर्षित करने के उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
कहने की जरूरत नहीं कि इन संगठनों को रसद, प्रशिक्षण और हथियार जैसे सहयोग के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ है। कई आतंकवादी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादी शिविरों में प्रशिक्षण ले रहे हैं और कश्मीर घाटी में घुसपैठ कर रहे हैं।
इस बढ़ती अस्थिरता के मद्देनजर, यह आवश्यक है कि भारत की प्रतिक्रिया भी उतनी ही उचित और सशक्त हो। आतंकवाद के खिलाफ युद्ध अब सीमाओं या युद्धक्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ-साथ कूटनीतिक क्षेत्र तक भी फैल गया है।
तैयारी भी उसी तरह से की जानी चाहिए।
बैसरन में हमले के दिन न केवल तीन आतंकवादी वहां मौजूद थे, बल्कि हमले स्थल के आसपास अतिरिक्त आतंकवादी भी छिपे हुए थे। यदि हमले के दौरान सुरक्षा बल वहां पहुंच जाते तो वे जवाबी कार्रवाई के लिए बैक-अप के रूप में कार्य करते और हमलावर आतंकवादियों को पीछे खदेड़ते।
अतिरिक्त आतंकवादी हमलावर आतंकवादियों से दूरी बनाए हुए थे ताकि किसी और को उनकी उपस्थिति का पता न चले। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की जांच से ऐसी जानकारी सामने आई है।
एनआईए सूत्रों का दावा है कि पहलगांव हमले में शामिल आतंकवादी भागने में असफल रहे। वे दक्षिण कश्मीर में छिपे हुए हैं।
हालांकि, सूत्र का यह भी दावा है कि इलाके में कई और आतंकवादी छिपे हुए हैं। जांचकर्ताओं का मानना है कि स्थानीय सहयोग के बिना आतंकवादियों के लिए इतने लंबे समय तक खाद्यान्न और आवश्यक सामग्री ले जाना संभव नहीं होता।
वे इस बात की भी जांच कर रहे हैं कि यह सहायता कौन उपलब्ध करा रहा है। लिहाजा यह तय है कि पाकिस्तान की तरफ से घुसपैठ करने वाले आतंकवादियों के मुद्दे पर भारत सुस्ती बरतने की स्थिति में नहीं है।
जब ऐसा लग रहा था कि स्थिति सामान्य हो रही है, उसी वक्त ऐसी वारदात ने इस सोच को ही सिरे से खारिज कर दिया है। दूसरी तरफ पाकिस्तान के जमीनी हालत ऐसे हैं जहां चंद पैसों के लिए आतंकवादियों को तैयार करना कोई कठिन कार्य नहीं है। ऐसा हम इससे पहले मुंबई हमले में जिंदा पकड़े गये कसाब के मामले में भी देख चुके हैं। अच्छी बात है कि इस बार देश इस मुद्दे पर एकजुट है।