Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
दिल्ली में महिलाओं को हर महीने मिलेंगे ₹2500! 'लक्ष्मी योजना' को कैबिनेट की मंजूरी, रक्षाबंधन पर आएग... सिर में नक्सलियों की गोली फंसी होने के बाद भी रोज लगा रहे 10 KM दौड़, पढ़ें हॉक फोर्स के जांबाज शिवक... फतेहपुर के सर्वोदय इंटर कॉलेज में छात्रों का हंगामा! बिजली, शौचालय व पेयजल की मांग को लेकर सड़क पर उ... IIT दिल्ली से घर बैठे सीखें AI और डेटा साइंस! सर्टिफिकेट प्रोग्राम के लिए आवेदन शुरू, जानें अप्लाई क... मसूरी-देहरादून मार्ग पर भारी भूस्खलन! मैगी पॉइंट के पास रेस्टोरेंट हुआ क्षतिग्रस्त, घंटों ठप रहा ट्र... छात्र प्रदर्शनों पर लाठीचार्ज मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश! निर्दोषों को तुरंत रिहा करने के ... मंथली एक्सपायरी के दबाव में बाजार में सुस्ती, मामूली गिरावट से निवेशकों के डूबे ₹1.10 लाख करोड़ फाजिल्का में बिजली विभाग का बड़ा एक्शन! 40 हजार उपभोक्ताओं पर ₹40 करोड़ का बकाया, कटने लगे कनेक्शन लुधियाना में दूसरे दिन भी सफाई कर्मचारियों का प्रचंड प्रदर्शन! कूड़ा लिफ्टिंग रोकी, माता रानी चौक पर... लुधियाना के SCD सरकारी कॉलेज में बनेगा पंजाब का पहला इंडोर वॉलीबॉल ऑडिटोरियम! ₹3.60 करोड़ की लागत से...

कौन राहुल गांधी का उत्तर मिला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक मीडिया समूह को कथित इंटरव्यू देते वक्त पूछे गये एक सवाल पर उत्तर दिया था कि कौन राहुल गांधी। वहां मौजूद पत्रकारों ने इस  उत्तर पर कोई प्रति प्रश्न नहीं किया बल्कि हंसकर उसे टाल गये। सामाजिक स्तर पर मोदी के उत्तर के साथ साथ मीडिया के इस आचरण की कड़ी आलोचना हुई थी।

चुनावी सभा में जिसे बार बार शहजादा कहकर श्री मोदी संबोधित करते थे, उसके बारे में सवाल को ऐसे टाल जाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। अब लोकसभा के भीतर कौन राहुल गांधी का सही उत्तर खुद नरेंद्र मोदी ने ही देश के सामने दिया है। लोकसभा के अध्यक्ष के चुनाव के मौके पर यह उत्तर सार्वजनिक तौर पर आया है।

18वीं लोकसभा के अध्यक्ष के रूप में ओम बिरला का चुनाव आश्चर्यजनक नहीं था। वास्तविक आश्चर्य इस तथ्य में निहित है कि श्री बिरला सर्वसम्मति से चुने गए उम्मीदवार नहीं थे। इसके कारण संसद में लगभग तीन दशकों में पहली बार सदन के उच्च पद के लिए मुकाबला देखने को मिला। हालांकि, परिदृश्य अलग हो सकता था।

विपक्ष का तर्क है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने परंपरा का उल्लंघन करते हुए, उसे उप-अध्यक्ष की भूमिका नहीं देने का फैसला किया, जिसके बाद उसे अपना उम्मीदवार – कांग्रेस के आठ बार के सांसद कोडिकुन्निल सुरेश – खड़ा करने के लिए मजबूर होना पड़ा। बदले में, शासन ने विपक्ष पर संसदीय परंपरा को खत्म करने की कोशिश करने का आरोप लगाया है, जिसके अनुसार अध्यक्ष को सत्ता पक्ष और उसके विरोधियों की सर्वसम्मति से चुना जाता है।

इस टकराव से दो बातें स्पष्ट होती हैं। पहली, श्री मोदी की सरकार, गठबंधन होने के बावजूद, अपने प्रभुत्वपूर्ण आवेगों के प्रति प्रतिबद्ध है और विपक्ष को कोई स्थान देने को तैयार नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी दलों, मुख्य रूप से तेलुगु देशम पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) की कायरता भाजपा को इस दुस्साहस में आगे बढ़ा रही है।

दूसरा, इस कार्यकाल में संख्याबल से मजबूत विपक्ष इस तरह की आक्रामकता के सामने पीछे नहीं हटेगा। यह उत्साहजनक है, क्योंकि इस चुनाव में लोगों ने एक ऐसे तीखे विपक्ष को जनादेश दिया है जो स्थापित संसदीय परंपराओं के प्रति उदासीन निर्वाचित शासन के खिलाफ जांच और संतुलन के रूप में काम कर सकता है: उप-अध्यक्ष के पद के लिए बातचीत करने की सरकार की उत्सुकता इसका एक हालिया उदाहरण है।

समय की मांग है कि दोनों विरोधी पक्ष, खासकर सरकार, अपने कामकाज में चुस्त रहें। संसद तब सबसे अधिक उत्पादक होती है जब वह सरकार और विपक्ष के बीच सहयोग के ईंधन पर चलती है। इस तरह के सहयोग की अनुपस्थिति, जैसा कि 16वीं और 17वीं लोकसभा में कुछ घटनाक्रमों से स्पष्ट था, भारतीय लोकतंत्र के लिए प्रतिकूल परिणाम हो सकते हैं।

सरकार की ओर से महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करने में बाधा डालना, असहमति की आवाज़ों को दबाने के लिए विपक्ष के सदस्यों को सामूहिक रूप से निलंबित करना, साथ ही सदन में बार-बार व्यवधान डालना और कार्यवाही स्थगित करना – ऐसी घटनाएँ जो पिछले 10 वर्षों में संसदीय कार्यवाही को प्रभावित करती रही हैं – ने उत्पादकता के साथ-साथ सदन की गरिमा को भी कम किया है।

18वीं लोकसभा भी इसी तरह की अशांति की ओर अग्रसर होगी या नहीं, यह विपक्ष से ज़्यादा सरकार के आचरण पर निर्भर करेगा। लेकिन इसके बीच से कौन राहुल गांधी के बाद का घटनाक्रम देश के सामने है। भारत जोड़ो यात्राओं के बाद राहुल गांधी को पप्पू साबित करने की साजिश पूरी तरह विफल हो चुकी है। अब तो भाजपा के मुखर नेता भी इस पर बात नहीं करते क्योंकि उन्हें जमीनी स्तर पर राहुल गांधी के प्रभाव का असर इस लोकसभा चुनाव में दिख चुका है।

इतना ही नहीं अब तो कांग्रेस सांसद लोकसभा में विपक्ष के नेता भी हैं, जिनका दर्जा कैबिनेट मंत्री के बराबर होता है। अब तो अनेक महत्वपूर्ण फैसलों को लेते वक्त ना चाहते हुए भी नरेंद्र मोदी को उनके साथ बैठना पड़ेगा क्योंकि नेता प्रतिपक्ष के नाते वह अनेक प्रमुख पदों पर लोगों के चयन की समिति का हिस्सा होंगे।

लिहाजा कौन राहुल गांधी के सवाल का बिना कोई उत्तर दिये भी नरेंद्र मोदी को बार बार देश को यह बताना पड़ेगा कि दरअसल राहुल गांधी कौन है। बात सिर्फ यही पर समाप्त नहीं होती। जिन दो सहारों के आसरे भाजपा चल रही है, वे दोनों यानी तेलगु देशम और जनता दल यूनाइटेड दोनों ही अपने अपने राज्य यानी आंध्र प्रदेश और बिहार को अपनी प्राथमिकता मानकर आंख बंद कर मोदी का समर्थन कर रहे हैं। इन दोनों दलों की प्राथमिकता पर अगर आंच आयी तो तय मानिये सारे समीकरण बदलने में पल भऱ की देर नहीं होगी और फिर से यह पता चल जाएगा कि कौन राहुल गांधी है।