Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
संसद के मानसून सत्र का आधा सफर पूरा, आखिरी 9 दिनों में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर टिकीं निगाहें पीएम मोदी ने मैसूर में किया 'विवेक स्मारक' का उद्घाटन: बोले- "भारतीय युवाओं के सामर्थ्य से तेजी से ब... तमिलनाडु पहुंचे राहुल गांधी का केंद्र पर बड़ा हमला, बोले— "परिसीमन से तमिल जनता की राजनीतिक ताकत छीन... वाराणसी में राहुल गांधी, पप्पू यादव और अवधेश प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज, धार्मिक भावनाएं आहत करने क... NSA अजीत डोभाल 'लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार 2026' से सम्मानित, अमित शाह बोले- "सुरक्षा इतिहास म... राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में नई SIT का कड़ा एक्शन, 200 से अधिक लोगों को पुलिस का नोटिस जारी पटियाला में राजा वड़िंग के कार्यक्रम में भारी हंगामा, चन्नी समर्थकों ने लगाए 'चन्नी जिंदाबाद' के नार... उज्जैन में महामंडलेश्वर ज्ञानदास पर दुष्कर्म की FIR: शादी का झांसा देकर युवती से दुष्कर्म का आरोप, B... उत्तराखंड में अतिक्रमण पर बड़ा एक्शन, मसूरी के लक्ष्मणपुरी में कथित अवैध नमाज स्थल पर चला बुलडोजर 'नेशनल टाउनहॉल अगेंस्ट E-20' में गरजे अरविंद केजरीवाल, केंद्र सरकार के सामने रखीं 3 प्रमुख मांगें

यानी पिछला वादा भी झूठा था

हजारों की संख्या में पंजाब के किसान हरियाणा की सीमा पर तीन स्थानों पर एकत्र हुए हैं, जहां उन्हें दिल्ली तक मार्च करने से रोक दिया गया है। प्रदर्शनकारी फसलों के लिए कानूनी रूप से गारंटीकृत एमएसपी, कर्ज माफी, कृषि क्षेत्र को प्रभावित करने वाले अंतरराष्ट्रीय समझौतों को रद्द करने और किसानों और कृषि श्रमिकों के लिए न्यूनतम 5,000 रुपये की पेंशन की मांग कर रहे हैं।

इनमें से कुछ मांगें 2021-22 में उनके पहले विरोध प्रदर्शन के दौरान उठाई गई थीं, जिसे भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में सुधार की मांग करने वाले तीन विवादास्पद कानूनों को वापस लेने के बाद बंद कर दिया गया था। उस वक्त खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि शायद उनकी तपस्या में कुछ कमी रह गयी थी।

लेकिन भाजपा की तरफ से आज तक इस पर कोई सफाई नहीं दी गयी कि तीनों कृषि कानूनों को लाने के पहले ही अडाणी समूह ने अपने बड़े बड़े गोदाम कैसे बना लिये थे। अब ताजी स्थिति पर गौर करें तो विरोध का नेतृत्व एसकेएम (गैर-राजनीतिक) द्वारा किया जा रहा है, जो उस निकाय से अलग हुआ समूह है जिसने पहले विरोध का नेतृत्व किया था।

यह विभाजन हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हित समूहों में दरार का प्रतीक है। कम से कम तीन अन्य प्रकार के विरोध प्रदर्शन ज़ोर पकड़ रहे हैं। पश्चिमी यूपी में किसान जेवर हवाईअड्डा परियोजना और यमुना एक्सप्रेसवे से प्रभावित लोग आमने-सामने हैं। हरियाणा के सोनीपत में किसान बिजली केबल के लिए भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं.

मूल एसकेएम और कई ट्रेड यूनियनों ने ओवरलैपिंग और अतिरिक्त मांगों के साथ 16 फरवरी को राष्ट्रीय ग्रामीण और औद्योगिक हड़ताल का आह्वान किया है जिसमें चार श्रम कोडों को निरस्त करना शामिल है। सरकार ने पंजाब के किसानों के साथ बातचीत शुरू कर दी है, लेकिन एमएसपी की कानूनी गारंटी की संभावना नहीं दिख रही है।

हरियाणा और दिल्ली में पुलिस ने किसानों को दिल्ली से 200 किमी से अधिक दूर रोक दिया है क्योंकि वे दृढ़ हैं कि किसानों को राष्ट्रीय राजधानी की सीमा के पास नहीं जाने दिया जाएगा जहां उन्होंने 2021-22 में घेराबंदी की थी। एफसीआई द्वारा एमएसपी-आधारित खरीद खाद्य सुरक्षा का आधार रही है, लेकिन इसमें सुधार का मामला मजबूत है। अनाज के अधिशेष उत्पादकों को एमएसपी योजना से लाभ हुआ है, लेकिन यह योजना गरीब क्षेत्रों में निर्वाह करने वाले किसानों को नजरअंदाज कर देती है।

खरीद के इस असमान भौगोलिक विस्तार ने कुछ क्षेत्रों में अस्थिर कृषि पद्धतियों को भी जन्म दिया है, जबकि देश के अन्य क्षेत्रों में किसान हमेशा गरीबी के कगार पर रहते हैं। यह सब खेती के लिए सार्वजनिक समर्थन में सुधार की मांग करता है, जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सहित कारणों से आवश्यक है। इसे व्यापक राजनीतिक परामर्श के माध्यम से और मौजूदा प्रणाली के लाभार्थियों को उत्पादन में विविधता लाने और उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करके बेहतर तरीके से हासिल किया जा सकता है।

लोकसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर विरोध के राजनीतिक स्वरों को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कृषि क्षेत्र को सार्वजनिक समर्थन के एक नए मॉडल की आवश्यकता है। इसे बाजार की दया पर नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार को इस प्रश्न पर राष्ट्रीय सहमति बनाने के प्रयासों का नेतृत्व करना चाहिए। लेकिन सरकार ने शायद इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना रखा है।

इस  बात को समझना चाहिए कि देश की आम जनता को ऐसे अहंकार से नाराजगी होती है। मणिपुर की हिंसा पर चुप्पी के बाद इस ज्वलंत मुद्दे पर भी प्रधानमंत्री का कुछ नहीं बोलना, अपने आप में जनता के भरोसे को कम करता है। चुनावी विश्लेषक रहे प्रशांत किशोर ने सही कहा है कि देश की बहुसंख्यक जनता मोदी सरकार के फैसलों को पसंद नहीं करती पर विकल्प के अभाव में वे भाजपा को ही वोट करते हैं।

लेकिन इस बात को समझना होगा कि दूसरे मुद्दों की तरफ देश का ध्यान भटकाने की कोशिश अब बेकार है क्योंकि पिछली बार के किसान आंदोलन के दौरान मीडिया द्वारा परोसे गये मिथ्या को जनता समझ चुकी थी। इसलिए दूसरे मुद्दों की तरफ जनता का ध्यान मोड़ने की कोशिश बेकार है। बड़े औद्योगिक घरानों की कर्जमाफी का फैसला बड़ी आसानी से लेने वाली सरकार को एमएसपी देने में क्या दिक्कत है, इस पर खुद श्री मोदी को बोलना चाहिए। बड़े घरानों की कर्जमाफी से सरकार को कोई फायदा नहीं हुआ लेकिन एमएसपी लागू होने से सरकार को घर से घाटा तो नहीं होगा क्योंकि इस दर पर वह फसल खरीदेगा, जिसे आगे बाजार में बेचा जा सकेगा। इस छोटी सी बात को कम पढ़ा लिखा व्यक्ति भी समझ रहा है पर पता नहीं सरकार को क्या परेशानी है।