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साथिया नहीं जाना कि जी ना लगे.. .. ..

साथियां यानी साथियों को एकजुट रखना इंडिया में कठिन होता जा रहा है। दरअसल हर पार्टी का अपना नेशनल और स्टेट पॉलिटिक्स का तेवर अलग अलग है। ऐसे में भाजपा के खिलाफ एक प्रत्याशी की सोच कब और कैसे धरातल पर उतरेगी, यह बड़ी बात है। राजनीतिक दिग्गज माथा पच्ची तो कर रहे हैं पर इस मंथन से अमृत निकलेगा या विष, यह अभी कोई नहीं जानता। सिर्फ एक बात इनलोगों को आपस में जोड़े हुए है कि मोदी का डंडा सभी पर एक जैसा चल रहा है। वह चाहे अरविंद केजरीवाल हो या ममता बनर्जी या तेजस्वी या अपने हेमंत भइया, सभी को केंद्रीय एजेंसियों ने परेशान कर रखा है।

दूसरी तरफ राम मंदिर के उदघाटन से पहले ही भाजपा वालों ने ऐसा माहौल बनाना प्रारंभ कर दिया है, जिसकी कोई काट अब भी विरोधियों के पास नहीं है। अभी से तीसरी बार मोदी सरकार और अबकी बार चार सौ पार के नारे चलने लगे हैं। दरअसल व्यक्तित्व के सवाल पर मोदी के खिलाफ विपक्ष का कोई भी कद्दावर नेता नहीं है। यह अलग बात है कि मल्लिकार्जुन खडगे धीरे धीरे ऊपर उठ रहे हैं लेकिन सक्रियता के मामले में कोई दूसरा नेता मोदी के करीब भी नहीं आ पाता। अब केदारनाथ से लेकर लक्ष्यद्वीप के समुद्र में एक जैसी ऊर्जा थामे मोदी के आगे इसी वजह से दूसरा कोई टिक नहीं पा रहा है। ऊपर से दूसरे दलों के नेता कितने भी आरोप क्यों ना लगे लें, केंद्रीय एजेंसियों की छापामारी में जो माल बरामद होता जा रहा है, वह जनता के मन में संदेह पैदा करने के लिए पर्याप्त है।

इंडिया गठबंधन के बीच अचानक से नीतीश कुमार के नाराज होने की सूचना फैली। गाहे बगाहे ऐसी सूचनाओं से भी भ्रम अइसा फैलता है कि गठबंधन के नेताओँ के एकजुट होने के बाद भी सभी पार्टियों का वोट किसी एक प्रत्याशी को मिलेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। अब खुशफहमी पालना है तो वोटों का प्रतिशत जोड़ते रहिए। नतीजा है कि सभी एक दूसरे से कह रहे हैं कि भाई साथ मत छोड़ देना वरना मुश्किल होगी।

इसी बात पर वर्ष 1969 में बनी फिल्म आया सावन झूम के का यह गीत याद आने लगा है। इस गीत को लिखा था आनंद बक्षी ने और संगीत में ढाला था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने। इसे लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

साथिया, साथिया.. आ.. आ..

साथिया नहीं जाना के जी ना लगे
साथिया नहीं जाना के जी ना लगे
मौसम है सुहाना के जी ना लगे
साथिया नहीं जाना के जी ना लगे

साथिया मैंने माना के जी ना लगे
जी को था समझाना के जी ना लगे
साथिया नहीं जाना के जी ना लगे

मेरे अच्छे बालमा छोडो आज बैयाँ
वो झुठा जो सइयां कल आये ना
जाके फिर आओगी, आके फिर जाओगी
आने जाने में जवानी ढल जाए ना

हो ओ छोडो आना जाना के जी ना लगे
साथिया नहीं जाना के जी ना लगे
साथिया मैंने माना के जी ना लगे

जी का बुरा हाल है, जब से जी लगाया
तुझे जी में बसाया तेरे हो लिए
जी का था खयाल तो, काहे जी लगाया
मुझे जी में बसाया, एजी बोलिये

हो ओ अब काहे पछताना के जी ना लगे
साथिया मैंने माना के जी ना लगे
साथिया नहीं जाना के जी ना लगे

जाने की तो बालमा मर्ज़ी नहीं मेरी
डर लगता ए वैरी जग वालों से
होए छड्डो वि ना सोणीयो
जग से डरते हो
जग खुद डरता है दिलवालों से

हो ओ छोडो ये बहाना के जी ना लगे
साथिया नहीं जाना के जी ना लगे
मौसम है सुहाना के जी ना लगे
साथिया नहीं जाना के जी ना लगे
साथिया नहीं जाना के जी ना लगे।।

अब चलते चलते ईडी की भी थोड़ी चर्चा कर ही लें। बेचारे पहली बार यह समझ कि कतक धान में कतक चाउर होता है। नेता के यहां छापा मारने गये थे तो जान बचाकर भागना पड़ा। गनीमत है कि सिर्फ सर फूटा। इससे साफ हो गया है कि बहुमत के आगे सुरक्षा एजेंसियां भी फेल हो जाती है। नाराज ग्रामीणों की भीड़ के सामने मौजूद सुरक्षा बल मूक दर्शक बने रहे। उन्हें भी पता है कि अगर फायरिंग कर दी तो उसका नतीजा क्या होगा।

अब हेमंत सोरेन से लेकर अरविंद केजरीवाल तक को डराने का काम तो जारी है पर सवाल यह है कि क्या वाकई यह लोग इस दबाव में आयेंगे। तेवर तो इनलोगों का भी अब उल्टा हो चला है। कोई भी अब ईडी को भाव तक देने को तैयार नहीं है। दूसरी तरफ जांच के नाम पर केंद्रीय एजेंसियां ऐसा कोई सबूत भी नहीं दिखा पा रही हैं जिससे जनता को लगे कि वाकई गड़बड़ी है. यह अलग बात है कि इसी जांच के नाम पर दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया से लेकर अनेक लोग जेलों में बंद हैं।