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सुरंग में फंसे मजदूरों को निकाला गया

  • पहली खेप में पांच लोग निकाले गये

  • मुख्यमंत्री धामी खुद राहत स्थल पर

  • काफी तेजी से हाथ से खोदा गया इलाका

राष्ट्रीय खबर

देहरादूनः उत्तराखंड के सिलक्यारा में जब आधुनिक विज्ञान की सारी कोशिशें असफल साबित हुई तो अंततः रैट माइनर्स ही अंतिम बचाव पंक्ति के तौर पर कारगर साबित हुए। यह अच्छी बात रही कि हाथ से खनन करने वालों को बहुत अधिक दूरी तक खनन नहीं करना पड़ा क्योंकि पहले ही मशीनों ने काफी सारा इलाका खोद दिया था। अब सूचना मिली है कि इस सुरंग से सारे मजदूरों को सकुशल निकाला जा चुका है।

लंबे समय तक चले ऑपरेशन के दौरान हाई-टेक, आयातित मशीनों के खराब होने के बाद उत्तराखंड सुरंग के अंदर फंसे 41 श्रमिकों को क्रमवार तरीके से अब निकाला जा रहा है। इसी क्रम में रैट माइनर्स का मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया है। इस विधि के खनन को असुरक्षित मानते हुए उसे प्रतिबंधित किया गया था। दरअसल उत्तर पूर्वी भारत में इस खनन को प्रतिबंधित किया गया था। दरअसल इस विधि से लोग अपने हाथ से ही कोयला खोदने का काम किया करते थे, जिसे असुरक्षित मानते हुए प्रतिबंधित कर दिया गया था।

चुनौतीपूर्ण अभियान के अंतिम चरण में 25 टन की ऑगर मशीन के विफल हो जाने के बाद फंसे हुए श्रमिकों को बचाने के लिए रैट-होल खनन कल शुरू हुआ। मैन्युअल ड्रिलिंग की इस पद्धति ने तेजी से प्रगति की है और खुदाई करने वाले अब उन श्रमिकों से मीटर की दूरी पर हैं जो 17 दिनों से कैद में हैं। इस तरह पूरे देश की प्रार्थना भी स्वीकार हुई और तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी फंसे मजदूरों को निकालने का काम प्रारंभ हो चुका है।

उत्तराखंड के मुख्यंत्री धामी भी वहां घटनास्थल पर मौजूद रहकर सारी परिस्थितियों का मुआयना करते रहे। एनडीआरएफ की टीम ने अपने तय मानदंड के मुताबिक ही अंदर से मजदूरों को निकालना प्रारंभ कर दिया है। इनकी सेहत जांच के लिए वहां बने अस्थायी अस्पताल के बाद मजदूरों को पहले से वहां तैनात एंबुलेसों के जरिए अस्पताल भेजा जाएगा।

बता दें कि रैट-होल खनन बहुत छोटे गड्ढे खोदकर, 4 फीट से अधिक चौड़े नहीं, कोयला निकालने की एक विधि है। एक बार जब खनिक कोयले की सीमा तक पहुँच जाते हैं, तो कोयला निकालने के लिए बग़ल में सुरंगें बनाई जाती हैं। निकाले गए कोयले को पास में ही डंप कर दिया जाता है और बाद में राजमार्गों के माध्यम से ले जाया जाता है।

रैट-होल खनन में, श्रमिक खदानों में प्रवेश करते हैं और खुदाई करने के लिए हाथ से पकड़े जाने वाले उपकरणों का उपयोग करते हैं। यह मेघालय में खनन का सबसे आम तरीका है, जहां कोयले की परत बहुत पतली है और कोई भी अन्य तरीका आर्थिक रूप से अव्यवहार्य होने का जोखिम रखता है। सुरंगों का छोटा आकार बच्चों को खतरनाक काम के लिए सबसे उपयुक्त बनाता है, और ऐसे राज्य में जहां आजीविका के लिए सीमित विकल्प हैं, कई लोग जोखिम भरे काम के लिए कतार में खड़े रहते हैं। कई बच्चे ऐसी खदानों में काम पाने के लिए खुद को वयस्क भी बताते हैं।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने अवैज्ञानिक होने के कारण 2014 में रैट-होल खनन पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन यह प्रथा बड़े पैमाने पर जारी है। पूर्वोत्तर राज्य में कई दुर्घटनाओं के परिणामस्वरूप रैट-होल खनिकों की मौतें हुई हैं। 2018 में, अवैध खनन में शामिल 15 लोग बाढ़ वाली खदान के अंदर फंस गए थे।

दो महीने से अधिक समय तक चले बचाव अभियान के दौरान केवल दो शव ही बरामद किये जा सके। ऐसी ही एक और दुर्घटना 2021 में हुई जब पांच खनिक बाढ़ वाली खदान में फंस गए। बचाव दल द्वारा एक महीने के बाद अभियान बंद करने से पहले तीन शव पाए गए थे। मणिपुर सरकार ने एनजीटी के प्रतिबंध को यह तर्क देते हुए चुनौती दी है कि इस क्षेत्र के लिए खनन का कोई अन्य व्यवहार्य विकल्प नहीं है। 2022 में मेघालय उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त एक पैनल ने पाया कि मेघालय में रैट-होल खनन बेरोकटोक जारी है।

एक अमेरिकी बरमा मशीन द्वारा मलबे को काटने में विफल रहने के बाद फंसे हुए श्रमिकों के बचाव के लिए यह गैरकानूनी प्रथा अब सामने आई है, जिससे उनका बचना मुश्किल हो गया है। इस कार्य के लिए विशेषज्ञों की दो टीमों, कुल 12 लोगों को दिल्ली से भेजा गया है। हालांकि, उत्तराखंड सरकार के नोडल अधिकारी नीरज खैरवाल ने स्पष्ट किया कि लाए गए लोग रैट माइनर नहीं बल्कि तकनीक के विशेषज्ञ थे।

विशेषज्ञों में से एक, राजपूत राय ने बताया कि एक आदमी ड्रिलिंग करता है, दूसरा मलबा इकट्ठा करता है और तीसरा उसे बाहर निकालने के लिए ट्रॉली पर रखता है। ऐसे विशेषज्ञ हाथ से पकड़े गए उपकरणों का उपयोग करके मैन्युअल रूप से मलबे को हटाने के लिए 800 मिमी पाइप के अंदर काम करते रहे।

करीब एक घंटा पहले ही सुरंग में फंसे मजदूरों को भी उनका काम करने की आवाज आने लगी थी। वैसे इस तरीके से खनन करना एक थका देने वाला काम है और खुदाई करने वालों को बारी-बारी से खुदाई करनी पड़ती है। बचाव दल के अनुसार, ये पेशेवर धातु की बाधाओं को भी काटने में कुशल हैं।