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पार्श्वनाथ हो गये भगवान विष्णु, पूजा प्रारंभ

  • कई बार प्रतिमा उठाने की हो चुकी कोशिश

  • अभिषेक के बाद मंदिर में स्थापित की गयी

  • नियमित पूजन भी होने लगा है उसके बाद

राष्ट्रीय खबर

पुरुलियाः वहां के एक जलभूमि से मिली प्रतिमा का नियमित पूजन प्रारंभ हो गया है। यह पहले ही पता चल गया था कि यह एक जैन भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा है। अपने गांव के करीब आने की वजह से स्थानीय लोगों ने इसे एक मंदिर में रखकर उसकी पूजा प्रारंभ कर दी है। इसे अब भगवान विष्णु की प्रतिमा कहा जाने लगा है। मजेदार स्थिति यह है कि प्रशासनिक अधिकारियों को पूरी स्थिति की जानकारी है फिर भी वे ग्रामीणों से भड़क जाने के भय से प्रतिमा को वहां से उठा नहीं रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप, पुरुलिया गांव में 9वीं या 10वीं शताब्दी के तीर्थंकर पार्श्वनाथ की मूर्ति को ‘विष्णु’ के रूप में पूजा जा रहा है। सुबह-शाम की आरती के साथ ही दोपहर में नये भगवान को भोग भी लगाया जा रहा है।

घटना की शुरुआत पिछले सोमवार को हुई। सुबह मूर्ति बरुआडी गांव के एक पानी के स्रोत के सूख जाने के बाद कीचड़ से इस प्रतिमा को निकाला गया। प्रतिमा होने की सूचना पर गांव वाले जुटे। किसी ने कहा, गांव में भगवान आये हैं। वहां से श्रद्धापूर्वक मूर्ति को उठाने के बाद उसे साफ किया गया और पानी से स्नान (अभिषेक) किया गयाय़ पुरुलिया मुफ्फसिल थाना क्षेत्र के गोलामारा में पहले से ही कालभैरब का मंदिर था। वहां नये देवता को स्थान मिलता है। सूचना संस्कृति विभाग, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) से कीमती मूर्ति की बरामदगी की जानकारी मिली है। उन्होंने उन्हें ग्रामीणों से छुड़ाने का भी प्रयास किया। लेकिन ग्रामीण मूर्ति देने में इंकार कर रहे हैं। एक बात तो वे कहते हैं कि भगवान स्वयं गांव में आए हैं, उन्हें कोई नहीं ले जा सकता।

जानकार मानते हैं कि भगवान पार्श्वनाथ की यह दुर्लभ प्रतिमा शायद पाल युग या उससे पहले की है। इस जिले में पहले भी ऐसी मूर्तियां मिल चुकी हैं। यह एक पूर्ण प्रतिमा है। इसकी कीमत करोड़ों में नहीं आंकी जा सकती। यह प्रतिमा शोध के लिए एक अमूल्य संसाधन है। उससे साबित हो जाता है कि प्राचीन काल में यहां जैन धर्म का बोलबाला था।

इस मूर्ति के मिलने के बाद भारतीय पुरातत्व सोसायटी ने पिछले मंगलवार को राज्य प्रशासक जनरल के कार्यालय को एक पत्र भेजा था। उन्होंने प्रतिमा के संरक्षण की जिम्मेदारी देने के साथ ही पत्र की एक प्रति पुरुलिया के जिलाधिकारी को भी भेजी। फिलहाल, मूर्ति को बरामद कर थाने में रखने का भी आदेश दिया गया है। लेकिन अभी तक किसी ने इस दिशा में पहल नहीं की है। पुरुलिया थाने और जिला पुलिस अधीक्षक से संपर्क किया गया तो बताया गया कि यह पुलिस का काम नहीं है। जिलाधिकारी रेस्क्यू का आदेश देंगे। पुलिस आवश्यक सहायता प्रदान करेगी। दुर्गापूजा का मौका होने की वजह से भी धार्मिक भावनाएं ना भड़के, इस पर पुलिस का ध्यान है।

जिला सूचना एवं संस्कृति पदाधिकारी सिद्धार्थ चक्रवर्ती ने कहा, प्रतिमा को बचाने की पहल करने के बावजूद बाधाएं आ रही हैं। सिद्धार्थ ने कहा, इस इलाके में पहले भी मूर्तियां बरामद हो चुकी हैं। कुछ दिन पहले एक बुद्ध प्रतिमा बरामद हुई थी। हमारे कार्यालय के अधीन राज्य पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग भी इस सब पर काम कर रहा है। लेकिन मौजूदा हालात में कोई भी मूर्ति देना नहीं चाहता। सिद्धार्थ ने यह भी कहा कि जब पुरुलिया-2 ब्लॉक के बीडीओ और पुलिस ने मूर्ति को हटाने की कोशिश की तो ग्रामीणों ने उन्हें घेर लिया।

स्थानीय तृणमूल नेता सिद्धार्थ महतो ने कहा, लोगों की भावनाएं इतिहास से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। गांव के लोग दिन-रात प्रतिमा के सामने पड़े रहते हैं। खाना वही खाता है जिसने इसे सबसे पहले देखा। सुबह-शाम लोग आरती देखने, आनंद लेने और मन्नतें लेने आते हैं। क्या इसका कोई मूल्य नहीं है?  गांव ही नहीं बल्कि आसपास के इलाके के लोग भी चाहते हैं कि मूर्ति यहीं रहे। वे चाहते हैं कि गांव में पूजा हो। यदि आवश्यक हो तो गाँव में शोध, संग्रह होना चाहिए। स्थानीय पंचायत समिति के कार्यपालक पदाधिकारी हरकील अंसारी ने भी लगभग यही कहा। उन्होंने कहा, जनता इसे देने के लिए तैयार नहीं है। पुरुलिया-2 ब्लॉक के बीडीओ देवजीत रॉय इस बात से सहमत हैं कि स्थिति लगातार जटिल होती जा रही है। उन्होंने कहा, मैं खुद गोलामारा गया था। गांव के लोगों का मानना ​​है कि प्राण दे देंगे परन्तु प्रतिमा नहीं जाने देंगे।